श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिलंगोट और कंठ लंगोट…“।)
अभी अभी # ८०१ ⇒ आलेख – लंगोट और कंठ लंगोट
श्री प्रदीप शर्मा
(Loin cloth & neck tie)
अंजनी के लाल रामभक्त हनुमान हों, अथवा चंदन चाचा के अखाड़े के पहलवान, केवल एक लंगोट ही उनका आभूषण भी होती है और परिधान भी। वैसे इसे आप पुरुषों का सनातन अंतर्वस्त्र भी कह सकते हैं। इसे धारण करने वाले लंगोट के पक्के कहलाते थे।
वैसे सनातन परिधान और आधुनिक फैशन में कोई खास फर्क नहीं है। आज के युवा मॉडल आपको लंगोट की जगह, और अधिक वीभत्स और अश्लील नजर आने वाली, अमेजन की कॉटन ब्रीफ्स पहने कैट वॉक करते नज़र आ जाएंगे।
आवश्यकता अगर आविष्कार की जननी है, तो अश्लीलता का अंधानुकरण आधुनिक फैशन का बाप। ।
हम जब छोटे थे, तो लंगोट पहनते थे। समय के साथ पहले पट्टे वाली बंबइया चड्डी और तदनंतर वीआईपी और लक्स अंडरवियर पर आ गए।
हां हमारे घर के नवजात शिशुओं के हमने भी पोतड़े बदले हैं। हर दस मिनिट में एक लंगोट गीली। आज की भाषा में इन्हें डायपर बदलना कहते हैं। शुक्र है, हगीज ने आजकल की माताओं को, फर्स्ट क्राय के सौजन्य से, इस परेशानी से निजात दिलवा दी है। हगीज हैं जहां, ममता भरा हग है वहां।
लंगोट की जब, बात निकलेगी, तो कंठ लंगोट तलक, जाएगी। आज का सभ्य पुरुष, भले ही लंगोट से करे इंकार, लेकिन वह कंठ लंगोट से करे प्यार।
हम भी, भले ही लंगोट से मुक्त हो गए हों, लेकिन शादी के समय, सबसे पहले, हमारे गले, कंठ लंगोट ही पड़ी। ।
झूठ क्यूं बोलें, हमें तो ठीक से टाई बांधते तक नहीं आती थी, लेकिन हमारे यार दोस्त, हमसे अधिक आधुनिक थे, उन्होंने विवाह के गठबंधन से पहले ही, गले में गांठ बांधना सिखला दिया। आप कह सकते हैं, पहले टाई हमारे गले पड़ी, और उसके बाद, सात जन्मों का अटूट बंधन।
ईश्वर जानता है, आज हम लंगोट और कंठ लंगोट, यानी loin cloth और neck tie से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, लेकिन एक ऐसे नेक बंधन में बंध चुके हैं, जिससे छूटना हमारे लिए नामुमकिन और असंभव है। हम जानते हैं, कोई हमारे गले नहीं पड़ सकता, ना लंगोट और ना ही कंठ लंगोट, लेकिन हमारी धर्मपत्नी के गले में हमारे नाम का मंगलसूत्र है, जिसमें हमारा मंगल ही मंगल है।।
काश, आज हमारे गले में भी, धर्मपत्नी के मंगलसूत्र की तरह, कोई एक नेक टाई, अर्थात् पवित्र बंधन होता। वैसे देखा जाए तो लंगोट और कंठ लंगोट भी एक तरह की गांठ ही है।
लंगोट और टाई दोनों बांधी जाती हैं। जो हमारी गांठ है, वही टाई की क्नॉट है। जो बंधा है, वह अनुशासित और संयमित है। टाई को भद्र पुरुषों यानी gentlemen का आभूषण कहा गया है।
वकील, अफसर, प्रोफेसर तो ठीक, हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक और विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल को भी, तस्वीरों में हमेशा आप, सूट बूट और टाई में ही देखेंगे।
हो सकता हो, लंगोट आपके लिए अंदर की बात हो, लेकिन एक पहलवान को सिर्फ लंगोट ही शोभा देती है। लेकिन टाई यूनिवर्सल है। मद्रास के विद्वान तो धोती पर भी कोट और टाई पहनते हैं।
हमने तो कई महंगी होटलों में वेटर्स को सूट और टाई में देखा है और ग्राहक को धोती कुर्ते में। अगर आज कबीर होते तो शायद यही कहते ;
टाई कहो या कंठ लंगोट
सुन सुन आए हांसी।
थोड़ी टाइट तो खांसी
और अगर किसी ने
जोर से कस दी
तो सीधे फांसी।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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