श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धरम करम …“।)
अभी अभी # ८०८ ⇒ आलेख – धरम करम
श्री प्रदीप शर्मा
आम आदमी रोजी रोटी के लिए मेहनत मजदूरी भी करता है, और अपनी श्रद्धा और हैसियत के अनुसार धरम करम भी ! वह कर्म को अगर पूजा समझकर करता है, तो उसका कर्म ही उसका धर्म हो जाता है। वैसे भी मेहनत और ईमानदारी से बड़ा न कोई धरम है और ना कोई करम। पढ़ते रहें लोग वेद पुराण, वह तो बस ढाई आखर प्रेम का पढ़कर ही संतुष्ट है।
सीधी सादी जिंदगी को इंसान ने कितना जटिल और दूभर बना दिया है। पेट की भूख से बड़ा कोई धर्म नहीं। भूखे भजन न होय गोपाला। चींटी से हाथी तक अपने पेट की भूख मिटाने के लिए कर्म करता है। यज्ञ से बढ़कर अगर कोई कर्म नहीं, तो कर्म से बड़ा भी कोई यज्ञ नहीं। रोजी रोटी का और मेहनत मजदूरी का भी वही रिश्ता है जो धर्म से कर्म का है और कर्म का यज्ञ से।।
यज्ञ आहुति को भी कहते हैं और त्याग को भी। ज्ञान भी यज्ञ है और कर्म भी यज्ञ। ज्ञानदान और निष्काम कर्म, दोनों किसी यज्ञ से कम नहीं। यज्ञ को ही sacrifice भी कहा जाता है। किसी अच्छे उद्देश्य के लिए अपने स्वार्थ की आहुति ही बलिदान है, यज्ञ है। अगर अपने करम से आप किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहे, तो आप एक तरह से धरम ही कर रहे हो। अपने हित से जब परहित जुड़ जाता है, तो वह परमार्थ हो जाता है। परमार्थ से बड़ा कोई धर्म नहीं, कोई यज्ञ नहीं।
कर्म और विचार से वातावरण की शुद्धि ही पर्यावरण की शुद्धि है। आसुरी शक्तियों के विनाश और पर्यावरण की शुद्धि के लिए ही तो यज्ञ हवनादि किये जाते हैं। अगर इंसान अपने काम से काम रखे, मेहनत और ईमानदारी से रोजी रोटी कमाए तो इससे बड़ा कोई कर्म नहीं, कोई धर्म नहीं और कोई यज्ञ नहीं। अपने स्वार्थ और सुख सुविधाओं के लिए आप कितने भी यज्ञ, दान पुण्य और हवन इत्यादि कर लें, जब तक मन, वचन और कर्म में शुद्धि नहीं आ जाती, तब तक किसी भी तरह का यज्ञ अथवा दान फलीभूत नहीं होता।।
मन अशांत, और विश्व शांति के लिए यज्ञ, हवन और पूजा पाठ। कर्म का अहंकार यज्ञ के फल को भी नष्ट कर देता है। असुर बड़े चालाक थे। अपने मनोरथ के लिए उन्होंने इन सबका बड़ी चतुराई से उपयोग किया और अलौकिक और पारलौकिक सिद्धियां प्राप्त कर लीं और बाद में उनका दुरुपयोग किया। आज भी बल, बुद्धि और ज्ञान के बल पर आसुरी शक्तियाँ वही काम कर रही हैं, उनका मायावी स्वरूप हमें छल रहा है। और जब कोई ऐसा ही आसुरी, जैविक हथियार मानवता के खिलाफ़ कोरोना बन उभर आता है, तो मानवता छलनी हो जाती है।
रहने दीजिए बड़े बड़े, मीठे बोल, जो कानों में दे मिश्री घोल ! अपना करम ही अपना धरम है, अगर ईमानदारी, निष्ठा और लगन से किया जाए। भौतिक सुख सुविधा की प्राप्ति के लिए अगर एक बार स्वार्थ, नफ़रत और बेईमानी का मार्ग अपना लिया, तो ना तो गंगा में मुक्ति मिलेगी ना किसी कुंभ स्नान से अमृत की प्राप्ति। करते रहिए नंबर दो के पैसे से दान पुण्य, देते रहिए दान दक्षिणा, यजमान को यश, कीर्ति और आशीर्वाद भले ही मिल जाए, मन को शांति नहीं मिलेगी। जिंदगी की धूप छांव में, कहीं से के.सी. डे साहब की आवाज़ कानों में पड़ रही है ;
तेरी गठरी में लागा चोर
मुसाफिर जाग जरा।
अपना धरम करम
आप ही पहचान जरा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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