श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाँधीजी की बकरी और… तीन बंदर।)

?अभी अभी # ८११  ⇒ आलेख – गाँधीजी की बकरी और… तीन बंदर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बकरी के लिए गाँधीजी का स्मरण ज़रूरी है क्या ? वैसे हमें बकरी क्यूँ याद आने लगी ! बचपन में गाँधीजी के तीन बंदर हर जगह नज़र आते थे, किताबों में और नीति कथाओं में। अब हम बड़े हो गए ! बच्चे भी अब जिंगल से ऊपर उठ चुके हैं। ब्लू व्हेल तक उनकी गहराई है आजकल।

आइए ! बकरी के साथ बंदर की ही बात भी कर लें। गाँधीजी बकरी का दूध पीते थे और तीन बंदरों द्वारा प्रतीक रूप में, उनके विचार लोगों तक पहुंचाए जाते थे। बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो। जब एक बंदर इतने अनुशासन में रहता है, तो हम तो आदमी हैं।।

आज का तर्क है, आँखें बंद करने से बुराई खत्म नहीं हो जाएगी ! आंखें खोलकर बुराई को खत्म करने की कोशिश करो। बुरा नहीं बोलने में क्या आपत्ति है भाई ? कोई हमें भला-बुरा कहता रहे, और हम चुपचाप बैठे रहें ? कतई नहीं ! हम या तो उसका मुँह नोंच लेंगे, या ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।

बुरा मत सुनो ! एक बंदर से कुछ तो सीख ले लो। चलो हमने यह बात मान ली। जो हमें बुरा लगता है, हम उसे अनसुनी कर देते हैं लेकिन अगर कोई किसी की बुराई कर रहा होता है, तो कान खड़े हो जाते हैं। कंट्रोल नहीं होता। दीवारों से कान लगाकर सुनते हैं। इसीलिए आजकल गाँधी जयंती पर भी तीन बंदरों के आदर्शों पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया जाता।।

लेकिन बकरी की उपेक्षा हमसे बर्दाश्त नहीं हुई ! आखिर गाँधीजी की बकरी ने हमारा क्या बिगाड़ा है। कितने प्रतिशत गांधीवादी बकरी का दूध पीते हैं ? आपके ऑप्शन हैं ! 100 %, 75 %, 33 % अथवा 0 %।

चर्खे की चर्चा आज इसलिए भी प्रासंगिक नहीं है कि आजकल चरखा केवल फोटू खिंचाने के काम आता है। हमारे नंबर एक स्कूल के प्रधानाध्यापक रामचंद्र जोशी पक्के गांधीवादी थे। वे हमसे स्कूल में तकली कतवाते थे और सुबह की प्रार्थना में सर्व-धर्म प्राथना भी करवाते थे। उनके ही प्रयासों से, हमारे स्कूल में पधारे, विनोबा जी के दर्शन लाभ का सुअवसर हमें प्राप्त हुआ था।

आज गाँधीजी का यत्र, तत्र, सर्वत्र गुणगान हो रहा है लेकिन बंदर तो ठीक, बकरी का भी कहीं पता नहीं है। गाँधीजी का सेवाग्राम एक बकरी बिना अधूरा था। हम गाय का दूध पीते हैं, भैंस का दूध पीते हैं, अमूल और साँची का दूध पी सकते हैं, तो बकरी ने हमारा क्या बिगाड़ा है। बकरी के दूध में वे सभी गुण विद्यमान हैं जो गाय के दूध में है। इसमें कैल्शियम है और प्रोटीन भी। इम्यून पॉवर को बढ़ाता है, कोलोस्ट्रॉल घटाता है, रक्तचाप सामान्य रखता है, बच्चों के शरीर के लिए लाभकारी माना गया है बकरी का दूध।।

लाठी में गुण बहुत है, की तर्ज़ पर बकरी में भी बहुत गुण हैं, लेकिन दूध के अलावा न तो हमने कहीं बकरी के दूध का दही बनते देखा, और न ही घी। मावे की तो बात छोड़ ही दीजिए। कुछ तो गड़बड़ है।

गाँधी जी ने बकरी का दूध तो पीया, लेकिन कभी दूध का फर्ज नहीं निभाया। अहिंसा के पुजारी बकरियों का दूध पीते रहे, और बकरी के परिवार की बलि चढ़ती रही। स्वदेशी आंदोलन और हिन्दू मुस्लिम एकता में वे इतने व्यस्त रहे कि इन छोटी छोटी बातों पर उनका ध्यान ही नहीं गया। अंग्रेजों से पंगा लेना ज़्यादा आसान लगा उन्हें।।

हम भले ही गाँधीजी के बंदरों के संदेश भूल जाएँ, एक भेड़ बकरी पालने वाला बकरी के दूध को नहीं भूला ! वह आज भी अपने बच्चों को बकरी का दूध ही पिलाता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वह गाँधीजी के बताए रास्ते पर ही चल रहा है। आप, हम और गाँधीजी के अनुयायी कब पियेंगे, कभी बकरी का दूध ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments