श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हाय मैं मर जावां ।)

?अभी अभी # ८१५ ⇒ आलेख – हाय मैं मर जावां ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुबह सुबह मरने की बात ? कतई नहीं ! यह एक पंजाबी तकिया कलाम है, जिसे हिंदी में हाय मै मर जाऊं कहते हैं। किसी की तारीफ़ करने का यह अजीबो गरीब अंदाज़ है, ठीक उसी तरह, जैसे तुझ पे कुर्बान मेरी जान।

यह मरने का बड़ा अजीब ज़िंदादिल अंदाज़ है, जिसमें किसी की जान नहीं जाती।

हमारे बीच ऐसे कई लोग मौजूद हैं, जो यह कहते नहीं थकते, जब वे कॉलेज में थे, तब उन पर कई लड़कियां मरती थीं। अब उन्हें कौन बताए, कि वे सब लड़कियां आज भी जिंदा हैं, और अपना सुखी जीवन गुज़ार रही हैं।।

जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु पर हमारा दिल आ जाता है, तो हम उस पर मरने लगते हैं। विश्वास नहीं होता न ! होते हैं कुछ जाबांज़ देशभक्त, जो सर पर कफ़न बांधे निकल पड़ते हैं मातृभूमि पर कुर्बान होने, मां, मेरा रंग दे बसंती चोला गीत गाते हुए। उनके लिए मौत ज़िन्दगी से बड़ी है, क्योंकि उनका मक़सद बड़ा है। वे सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़ते हैं, और देश के लिए शहीद हो जाते हैं। दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए।

देशभक्ति की तरह भक्ति में भी जान की परवाह नहीं की जाती ! कबीर साहब तो साफ कह गए हैं ;

सर कटाए, घर जलाए,

वो हमारे साथ आए।

हम ऐसी शर्तों के ख़िलाफ़ हैं। इन सूफ़ी संतों ने ईश्वर को अपनी प्रेमिका बना रखा है, और खुद आशिक बने घूमते रहते हैं। ये हमेशा मरने मारने की ही बात करते हैं। आशिक का ज़नाजा है, बड़ी धूम से निकले।

और हमारे ये शायर !

महफ़िल में जल उठी शमां परवाने के लिए,

प्रीत बनी है दुनिया में, मर जाने के लिए।

अब यह क्या बात हुई ;

जान चली जाए, जिया नहीं जाए

जिया चला जाए, तो जीया नहीं जाए। और ;

वो देखो मुझसे रूठकर

मेरी जान जा रही है।।

दूसरे की जान को अपनी जान कहना कहां की समझदारी है। और दलील देखिए ! जब दो दिल एक हो जाते हैं, तो दोनों एक जान हो जाते हैं। यारी दोस्ती में भी बात बात पर, तेरे लिए जान हाज़िर है, बोल कर के तो देख, तो कहने वाले बहुत हैं, लेकिन एक पांच सौ का गांधी छाप मांगो तो मिमियाने लगते हैं। यार जान ले ले, पर पैसे की बात मत कर।

हमारे जीवन में जब भी हमारी जान बची है, हम यही कहते पाए गए हैं, जान बची और लाखों पाए। आखिर वो लाखों फिर गए कहां, कोई नहीं बताता। लगता है स्विस बैंक में पैसा लोगों ने जान पर खेलकर ही जमा किया है।

यह अलग बात है, जान किसी और की भी हो सकती है।।

कई बार हमारी जान मुट्ठी में आ जाती है। डर के मारे लोग मुट्ठी नहीं खोलते। इधर मुट्ठी खोली, उधर प्राण पखेरू बन उड़ते नजर आए। जी और जान का भी चोली दामन का रिश्ता है। जब हम जी जान एक कर देते हैं, तो क्या बच रह जाता है।

बच्चा जब मां को ज़्यादा परेशान करता है, तो मां भी यही कहती है, जान मत खा ! ये ले पांच रुपए। जा Kit kat ले आ। बचपन में जब मां पिताजी के साथ मेला देखने जाते थे, तो पिताजी उंगली नहीं छोड़ते थे। एक बार मेले में सब गुमते हैं और जब बड़ी मुश्किल और मन्नतों के बाद मिलते हैं, तब मां की जान में जान आती है।।

रेडियो पर फरीदा आपा कह रही हैं, आज जाने की ज़िद ना करो।

हाय मर जाएंगे, हाय लुट जाएंगे, ऐसी बातें किया ना करो।

चलो ! हम भी ऐसी बातें नहीं करते। जान है तो जहान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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