श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खूंटी और ताक…“।)
अभी अभी # ८२८ ⇒ आलेख – खूंटी और ताक
श्री प्रदीप शर्मा
एक समय था, जब हर चीज के लिए एक स्थान नियत होता था, और आदमी रात को निश्चिंत हो, चैन की नींद सोता था। लोग क्या कहते हैं, उसकी उसे कोई परवाह नहीं होती थी, कई बार तो वह फिक्र को खूंटी पर टांग और अक्ल को ताक में रखकर आराम से घोड़े बेचकर सो जाता था। सुबह जब उठता तो कहता, अभी दो मिनिट में आया। फिक्र को खूंटी से उठाया, और अक्ल को वापस भेजे में पहुंचाया। कितनी सहज, सरल और पारदर्शी सुरक्षित अभिरक्षा (सेफ कस्टडी )।
जितनी सुविधा, उतनी सुरक्षा !
तब कहां सीमेंट कांक्रीट और लोहे के मकान होते थे। अक्ल की तरह दीवारें भी गारे मिट्टी की और मोटी होती थी। एक घर में कई घर होते थे। बड़े घरों में तो रसोईघर, भंडार घर, पूजा घर, स्नानागार, और शौचालय भी होते थे। महिलाओं के लिए अगर कोठरी होती थी तो पुरुषों के लिए बैठक भी होती थी। घरों में महंगे पर्दों में पैसा बर्बाद करने के बजाय महिलाएं ही परदा कर लिया करती थी।।
मोटी मोटी दीवारों में आराम से लकड़ी की खूंटियां भी ठुक जाती थी, और गोदरेज की स्टील की अलमारी की जगह दीवारों में ही बड़ी छोटी ताक बनवाई जाती थी। छोटी ताक को आला कहते थे, जहां कभी जलता हुआ दीया अथवा गोरी की कान का बाला भी रख दिया जाता था। घरों में सिर्फ दीया बाती, और चिमनी लालटेन का ही प्रकाश होता था। दिमाग की बत्ती का तो पता नहीं, लेकिन हां तब घरों में बिजली के बल्बों का प्रवेश नहीं हुआ था और ऐसी ही परिस्थिति में शायर ऐसे गीत लिखने को मजबूर हो जाता था ;
ढूँढो, ढूँढो रे साजना
मोरे कान का बाला।
ताक और अलमारी और खूंटी और खूंटे में थोड़ा फर्क होता है। ताक और अलमारी तो घर के अंदर होती है लेकिन जहां खूंटी का दायरा कोठरी और बैठक तक ही सीमित होता है, खूंटा तो चौगान से लेकर मैदान तक कहीं भी गाड़ दिया जाता है। कुछ बुजुर्ग तो चौगान में ही खटिया पर खूंटा डालकर ही पड़े रहते थे,
जो आया, उसकी खाट खड़ी की। घरों में उनकी खांसी ही वॉच डॉग का काम करती थी। आनंद बख्शी के गीत का जिक्र, ना बाबा ना। हम बुजुर्गों का सम्मान करते हैं।।
बाबू जी का कुर्ता हो, टोपी हो, छड़ी हो अथवा छाता, बच्चे का बस्ता हो या कमीज, सबकी जगह खूंटी ही तो होती थी। दीवारों में इनबिल्ट फर्शी की अलमारी के खाने हमें अलॉट किए जाते थे। पूरी पारदर्शी व्यवस्था थी, इसलिए खुल जा सिम सिम जैसा कुछ था ही नहीं। वही हमारा वॉर्डरोब और वही बुक शेल्फ।
आज चार इंच की दीवार में एक कील नहीं ठुकती, उसे भी ड्रिल करना पड़ता है। ताक और अलमारी की जगह वार्डरोब ने ले ली है। नये नये हैंगर्स और हुक्स आ गए हैं, घर बड़ा साफ सुथरा और सजाधजा रहने लगा है। बुजुर्गो के भी बेडरूम होने लग गए हैं, और वे भी कमोड के मोड पर चले गए हैं। ताक और खूंटी एंटीक हो गए हैं।।
आज घरों में भंडार घर नहीं, गेहूं की कोठियां नहीं, लेकिन हां महंगे सोफे, कालीन, वॉल पेंटिंग्स जरूर हैं। घरों में चटाई भले ही नहीं हो, डाइनिंग टेबल और डबल बेड, प्राथमिक आवश्यकता है। कौन आजकल रसोई में पटे पर बैठकर भोजन करने से पहले अपना कुर्ता खूंटी पर टांगता है और रात को ताक में रखा अपना चश्मा तलाशता है। ए .सी. और रिमोट के जमाने में भी कहीं कोई हाथ से पंखा झलता है ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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