श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न्यूसेंस वैल्यू।)

?अभी अभी # ८३१ ⇒ आलेख – न्यूसेंस वैल्यू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर परेशानी की हमें कीमत चुकानी पड़ती है। क्या परेशानी का कोई मूल्य नहीं होता। न्यूसेंस को आप आफ़त मुसीबत अथवा उपद्रव भी कह सकते हैं। इसे अनुभव तो किया जा सकता, लेकिन परिभाषित नहीं किया जा सकता।

अगर न्यूसेंस का जीवन में महत्व नहीं होता तो इसे यूं ही वैल्यू कहकर महिमामंडित नहीं किया जाता। रास्ते में चलते समय लगी ठोकर, और हर पांव में लगे कांटे की भी एक न्यूसेंस वैल्यू होती है।

वह हमें विचलित भी करती है और सतर्क भी। क्या बालहठ, बच्चों की मस्ती, शैतानी और धमा चौकड़ी एक तरह की न्यूसेंस वैल्यू नहीं। लेकिन कितनी प्यारी है यह न्यूसेंस वैल्यू।।

स्कूल कॉलेज के दिनों में क्या हम सिर्फ पढ़ाई ही करते थे। कॉलेज में क्लास से तड़ी मारकर फिल्में देखना, नकल, गुंडागर्दी और लड़कियों से छेड़छाड़ सबकी अपनी न्यूसेंस वैल्यू थी। मुझे अच्छी तरह याद है जो लड़के तब प्रोफेसर्स की नाक में दम कर देते थे, आगे चलकर वे जीवन में अच्छे और प्रतिष्ठित नागरिक भी बने, कोई पुलिस में, कोई आर्मी में, तो कोई सिविल सर्विसेज में।

कहीं कहीं अच्छाई की तो जीरो वैल्यू होती है और न्यूसेंस वैल्यू ही काम आती है। सीधी उंगली से जब घी नहीं निकलता, तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है।

कानून अपने हिसाब से काम करता है, अतिक्रमण और आतंक का तो बुलडोजर से ही हिसाब चुकता किया जा सकता है।।

अगर आप लोकतंत्र की दुहाई देते हो, तो विपक्ष की न्यूसेंस वैल्यू को भी बर्दाश्त करना ही होगा। अपनी सुरक्षा और स्वार्थ के लिए अगर आपने कोई स्वामिभक्त कुत्ता पाला है, तो उसके भौंकने के न्यूसेंस को भी आपको बर्दाश्त करना पड़ेगा। रात को कुत्ते के भौंकने से अधिक परेशान और विचलित करने वाली कोई न्यूसेंस वैल्यू नहीं।

नादां की दोस्ती जी का जंजाल। जो अवांछित है, उसकी भी कुछ तो न्यूसेंस वैल्यू है। स्वार्थ और खुदगर्जी की इस दुनिया में कब कौन किस गधे को अपना बाप बना ले, कुछ कहा नहीं जा सकता।।

अब खोटे सिक्के को ही ले लीजिए। नहीं मामा से काना मामा ही भला। विवाह के प्रसंग में कभी कभी तो बारातियों के नाम पर, सड़क पर, न्यूसेंस वैल्यू ही नजर आती है। जो अधिक लुंगाड़े टाइप व्यक्ति होता है, जब वह नशे में धुत्त होकर नागिन डांस करता है, तो नोटों की बरसात शुरू हो जाती है।

क्या कभी आपने कचरे के बारे में सोचा है। कभी कचरे की न्यूसेंस वैल्यू ने हमारा जीवन नर्क बना रखा था। हर सड़क चौराहे, गली कूचे में कचरे का ही राज था। जगह जगह गंदगी और बदबू ही बदबू और कचरे के ढेर में मुंह मारते आवारा ढोर! और हम कचरा फेंकने वाले, बदबू के मारे, नाक पर रूमाल रख वहां से निकल जाते थे। लेकिन देखिए स्वच्छ भारत के दौरान घूरे के दिन भी फिरे और हर नागरिक ने कचरे को इज्जत देना सीख लिया। जिस कचरे की कभी न्यूसेंस वैल्यू थी, आज वह कहां से कहां पहुंच गया। दृढ़ संकल्प से सब कुछ मुमकिन है।।

हर सरकारी दफ़्तर में भरमार होती है न्यूसेंस वैल्यू की। चपरासी और बाबू से लेकर अफसर तक। जो आदमी काम का है, बस उसकी ही वैल्यू है। कभी कभी लोग पूछ भी लेते हैं, किस निकम्मे को मुंह लगा रखा है। लेकिन ऐसे नल्ले, पिछलग्गू और न्यूसेंस वैल्यू वाले व्यक्ति ही वक्त ज़रूरत काम आते हैं और चुनाव की वैतरणी पार लगवाते हैं।

हम अच्छी तरह जानते हैं आज के अखबार, सोशल मीडिया, टीवी न्यूज और टीवी सीरियल की न्यूसेंस वैल्यू, लेकिन इनके साथ के बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। बहुत काम की है न्यूसेंस वैल्यू, इसे कभी कम नहीं आँकें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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