श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पनघट और जमघट…“।)
अभी अभी # ९७५ ⇒ आलेख – पनघट और जमघट
श्री प्रदीप शर्मा
कुछ यादें भी बड़ी नटखट होती हैं। कहाँ गाँव की गोरी, घूंघट, पीपल की छांव और पनघट और कहां, शहर के हर चौराहे पर भीड़भाड़, धक्का मुक्की और जमघट ! पनघट पर सखियों में कोई भेदभाव नहीं होता, कोई रंगभेद की नीति भी नहीं होती, फिर भी जहां पनघट है, वहां सब गोरी, गोरी ही होती है, और काला मात्र एक घनश्याम। और जहां काले गोरे, वृद्ध युवा, बेकार, कामकाजी और आम जरूरतमंद इंसानों का जमघट हो, वहां, अप्रैल मई की गर्मी ही गर्मी, परेशानी और पसीना ही पसीना।
यमुना के तट पर अथवा किसी पनघट पर कभी गोरी मटकी लेकर पानी भरने जाती होगी, हमने तो सरकारी नल और ट्यूब वेल पर स्त्री, पुरुष और बच्चों को, हंडा, बाल्टी और मटके लिए, कतार लगाते देखा है। अब आप इसे पनघट कहें अथवा जमघट। पानी के लिए ही हर घट है, और हर घट में जल से ही जिंदगानी है।।
सुबह की सैर सबके नसीब में नहीं होती। कैसे कैसे नजारे देखने को मिलते हैं, मॉर्निंग वॉक के बहाने। स्मार्ट सिटी बनता, मेट्रो सुविधा के लिए आतुर, स्वच्छता का छक्का लगा चुका, मेरे शहर का एक व्यस्ततम चौराहा ! जब नेताओं के नामों की सूची समाप्त हो जाती है तो चहुंमुखी विकास के लिए मुंह फैलाते शहर में आगरा बॉम्बे रोड से काम नहीं चलता। रिंग रोड और बायपास तक बात पहुंच जाती है। जहां जगमगाती स्ट्रीट लाइट और सौंदर्यीकरण के साथ साथ सड़क को डिवाइडर से बांटा जाकर दोनों ओर सर्विस रोड से भी आवागमन जारी रहता है।
आप अपनी सुरक्षा के लिए खुली सड़क पर नहीं, सर्विस रोड पर ही अपना सीना ताने निकल पड़ते हैं। इस बार जूता जापानी नहीं, बाटा, एडिडास अथवा स्वदेशी भी हो सकता है।
अगर आप आत्म निर्भर हैं तो पांच छ: हजार का जूता भी पहन सकते हैं। पतलून भी इंग्लिस्तानी नहीं, देसी जीन्स की हो सकती है।।
घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, मैं उस चौराहे पर पहुंच जाता हूं जहां मेरा वास्ता पनघट और जमघट से एक साथ पड़ने वाला है। चौराहे के पास ही, नगर निगम का एक चलित झोनल कार्यालय है, जहां स्वच्छता के लिए मुस्तैद वाहन और सफाई कर्मचारी सड़क पर गंभीर वार्तालाप करते देखे जा सकते हैं। पास ही पानी के टैंकर भरने के लिए भी नलों की व्यवस्था है जिस कारण बिना गोरी के पनघट सा दृश्य उपस्थित हो जाता है। टैंकर को आप कौन सा घट कहेंगे।
जहां भी भीड़ होगी, जमघट होगा, पनघट होगा, यातायात तो बाधित होगा ही। वहीं खाली स्थान को और उपयोगी बनाने के लिए दिहाड़ी श्रमिकों के लिए अस्थायी शेड का निर्माण भी किया गया है। रोजाना रोजगार की तलाश में वहां सुबह सुबह इन्हें इंतजार करते देखा जा सकता है। जहां इतना सब कुछ हो, वहां चाय और गुटका नहीं हो, यह हो नहीं सकता। बस आप मान लीजिए, राहगीरों के आवागमन के लिए बना यह सर्विस रोड इन सेवाभावी महानुभावों की उपस्थिति के कारण, सुबह सवेरे ही, ट्रैफिक जाम का दृश्य उपस्थित कर देता है।।
एक बड़ी सी कार, कहीं से आकर रुकती है। भवन निर्माण के लिए श्रमिकों की आवश्यकता है। छंटनी और भाव ताव सड़क पर ही तय हो जाता है। एक झुंड जाता है, दूसरा झुंड उसकी जगह ले लेता है। किसका नसीब खुलेगा, इंतजार ही एकमात्र विकल्प है।
कोरोना के कहर के कारण पिछले कुछ समय से समय की गति रुक सी गई थी।
यह जमघट यूं ही नहीं है। बहुत पीड़ा है, बड़ा अभाव है, तुम नहीं समझोगे रमेश बाबू ! बच्चों के स्कूल के वाहन भी अब इन्हीं सड़कों पर दौड़ेंगे। आज का अमर पनघट से भले ही बच जाए, जमघट से नहीं बच सकता। बहुत हुआ ऑनलाइन, अब अमर, तेरी बस आ गई, इस्कूल चल ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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