श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
आलेख – सुमित्र जी की समावेशी साहित्यिक दृष्टि
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
जबलपुर के साहित्यिक परिदृश्य में डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ एक ऐसे सृजनधर्मी साहित्यकार के रूप में उभरे जिनकी उदार साहित्य दृष्टि ने न केवल साहित्य जगत बल्कि समस्त सांस्कृतिक परिवेश को गहराई तक प्रभावित किया। छह दशकों से अधिक समय तक फैले उनके साहित्यिक जीवन ने हिंदी साहित्य को चालीस से अधिक कृतियाँ प्रदान कीं, जिनमें कविता, निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना और समालोचना जैसी विविध विधाओं में उनकी रचनात्मकता की छाप अंकित है। उनकी लेखनी पर सवार यात्रा में निरंतर विकास और प्रयोगशीलता देखने को मिलती है, जहाँ 1960 के दशक में ही उनकी कविताओं ने प्रतीक, भावबोध, बिम्ब विधान और शब्दावली के स्तर पर परिपक्वता का परिचय दिया था।
डॉ सुमित्र की साहित्यिक दृष्टि की सबसे विशिष्ट बात थी नवोदित रचनाकारों के प्रति उनका उदार और प्रोत्साहनपूर्ण रवैया। वे दूसरों के सृजन को अपने सृजन से ज्यादा महत्व देते थे, इसी भावना के तहत उन्होंने ‘पाथेय प्रकाशन’ की स्थापना की जिसके माध्यम से अनेक युवा रचनाकारों की कृतियाँ प्रकाश में आईं। डॉ शिव कुमार सिंह ठाकुर के शब्दों में, “उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध, नाटक, उपन्यास, आलोचना, समालोचना आदि के विविध क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास भी किया है।” हेमन्त बावनकर को 42 वर्ष पूर्व लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था – “तुम्हारा लेखन पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि तुम नौसिखिये हो… सबसे बड़ी बात यह है कि संवेदना की शक्ति और जीवन की दृष्टि तुम्हारे पास है।” यह पत्र उनकी उदार समावेशी साहित्यिक दृष्टि का परिचायक उदाहरण है।
उनकी साहित्य दृष्टि की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी साहित्य को समाज से जोड़ने का प्रयास। डॉ सुमित्र ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम समझा। उनकी रचनाओं में समाज के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया। उनके लेखन में भावदीप्त यथार्थ की अभिव्यक्ति मिलती है, जो पाठकों के मन में गहरी अनुभूति जगाती है।
डॉ सुमित्र की प्रमुख कृतियों में ‘संभावना की फसल’, ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द’, ‘आदमी तोता नहीं’, ‘यादों के नागपाश’, ‘खूंटे से बंधी गाय-गाय से बंधी स्त्री’ और बुंदेली काव्य ‘बढ़त जात उजियारो’ हैं।
साहित्य सृजन के साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाई। वे जबलपुर की साहित्य सांस्कृतिक संस्था ‘मित्रसंघ’ के संस्थापक सदस्य रहे। इसके अलावा वे ‘पाथेय साहित्य कला अकादमी’ के संस्थापक भी रहे, जिसके माध्यम से उन्होंने अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय और कोयला व खान मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समितियों में भी सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने हिंदी भाषा के विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण सुझाव दिये।
27 फरवरी 2024 को उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य जगत ने एक ऐसे साहित्य स्तंभ को खो दिया जिसने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। किन्तु उनकी साहित्यिक दृष्टि और रचनात्मक विरासत आने वाली पीढ़ियों को साहित्य साधना के लिए प्रेरित करती रहेगी। डॉ सुमित्र का मानना था कि “लेखन ही जीवन का धर्म कर्म और अध्यात्म है”, और इसी आस्था को उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। उनकी उदार साहित्य दृष्टि ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नई चेतना का संचार किया और नव रचनाकारों को मंच व प्रोत्साहन देकर साहित्यिक लोक का समावेशी विस्तार किया है। उनकी साहित्यिक साधना, संगठन और संपादन हर कसौटी पर नवोन्मेषी और प्रेरणादायक बनी रहेगी।
उनकी पुण्य स्मृति को नमन🙏
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




बेहतरीन अभिव्यक्ति
सादर नमन