डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

बदलते दौर की दहलीज़ पर विवाह: एक सामाजिक मंथन

परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के द्वंद्व में उलझा आज का युवा मन

“बेटा, अब नौकरी भी लग गई है, उम्र भी हो रही है। शादी की बात आगे बढ़ाएँ?”

रात के खाने के बाद पिता ने सहज भाव से पूछा।

बेटे ने कुछ क्षण चुप रहकर पानी का गिलास रखा और धीमे स्वर में कहा, “पापा, शादी से इंकार नहीं है… बस जल्दबाज़ी से डर लगता है।”

माँ ने हैरानी से पूछा, “डर? शादी से भी कोई डरता है?”

बेटा मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में एक गहरी चिंता छिपी थी।

“डर शादी से नहीं… उस रिश्ते से है जो अगर सही न चला तो दो ज़िंदगियाँ टूट जाएँगी।”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

 

यह संवाद केवल एक घर की कहानी नहीं है। आज देश के लाखों घरों में इसी तरह की बातचीत अलग-अलग शब्दों में हो रही है। माता-पिता चिंतित हैं कि बच्चे विवाह में देर क्यों कर रहे हैं, जबकि युवा सोच रहे हैं कि जीवन का इतना बड़ा निर्णय केवल समाज की अपेक्षाओं के आधार पर कैसे लिया जाए।

 

समय बदल रहा है और उसके साथ विवाह को देखने का दृष्टिकोण भी।

एक समय था जब विवाह जीवन का स्वाभाविक पड़ाव माना जाता था। एक निश्चित उम्र आई, परिवार ने रिश्ता देखा और विवाह हो गया। उस समय व्यक्तिगत पसंद से अधिक परिवार, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था महत्वपूर्ण होती थी।

 

लेकिन आज का युवा एक बिल्कुल अलग दुनिया में बड़ा हुआ है।

उसने अवसरों की दुनिया देखी है।

उसने स्वतंत्र निर्णय लेना सीखा है।

उसने रिश्तों की सफलता भी देखी है और टूटन भी।

 

शायद इसी कारण वह विवाह को केवल सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि जीवनभर की साझेदारी के रूप में देखता है।

कई बुजुर्ग इसे जिम्मेदारी से बचना मान लेते हैं।

 

लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

शायद नहीं।

वास्तव में आज का युवा जिम्मेदारी से भाग नहीं रहा, बल्कि जिम्मेदारी को पहले से अधिक गंभीरता से समझ रहा है। वह जानता है कि केवल सामाजिक दबाव में लिया गया निर्णय दो लोगों का ही नहीं, दो परिवारों का जीवन भी प्रभावित कर सकता है।

आज के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता असफल रिश्तों का बढ़ता अनुभव है।

वे अपने आसपास टूटते विवाह, लगातार झगड़े, मानसिक तनाव और तलाक की घटनाएँ देख रहे हैं। वे समझते हैं कि केवल साथ रहना ही सफल विवाह नहीं होता। साथ में सम्मान, विश्वास, संवाद और मानसिक सामंजस्य भी होना चाहिए।

इसीलिए वे विवाह से पहले व्यक्ति को समझना चाहते हैं। वे जल्दबाज़ी से अधिक सही निर्णय को महत्व देते हैं।

इस बदलाव का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है आर्थिक आत्मनिर्भरता।

आज बेटियाँ भी उतनी ही पढ़ी-लिखी हैं जितने बेटे। दोनों अपने पैरों पर खड़े हैं। दोनों अपने करियर के लिए मेहनत करते हैं।

ऐसे में विवाह का वह पारंपरिक मॉडल, जिसमें त्याग की अपेक्षा केवल एक पक्ष से की जाती थी, स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आ गया है।

आज का प्रश्न यह नहीं है कि “समझौता कौन करेगा?” बल्कि यह है कि “सहयोग दोनों कैसे करेंगे?”

आधुनिक विवाह में बराबरी केवल अधिकारों की नहीं, जिम्मेदारियों की भी होनी चाहिए।

यदि दोनों कमाते हैं, तो दोनों घर भी सँभालें।

यदि दोनों सपने देखते हैं, तो दोनों एक-दूसरे के सपनों का सम्मान भी करें।

यही सोच नए दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेकिन इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष माता-पिता हैं।

उनकी चिंता भी गलत नहीं है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा है कि जीवन में साथी का होना कितना महत्वपूर्ण है। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अकेले न रहें, उन्हें समय पर जीवनसाथी मिले और वे सुरक्षित भविष्य जी सकें।

उनकी चिंता प्रेम से जन्म लेती है। लेकिन कई बार वही चिंता दबाव का रूप ले लेती है। यहीं से पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

दरअसल, माता-पिता और बच्चों के बीच केवल उम्र का अंतर नहीं है। यह दो अलग-अलग समयों का अंतर है।

 

एक पीढ़ी ने सीमित अवसरों की दुनिया देखी।

दूसरी पीढ़ी असीमित विकल्पों के बीच बड़ी हुई।

 

एक ने स्थिरता को प्राथमिकता दी।

दूसरी अर्थपूर्ण जीवन और मानसिक संतुलन को भी उतना ही महत्व देती है।

 

इसलिए दोनों की सोच अलग होना स्वाभाविक है।

समस्या सोच के अलग होने में नहीं है। समस्या तब होती है जब दोनों एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते हैं।

 

हर रिश्ता संवाद से मजबूत होता है और विवाह पर संवाद तो उससे भी अधिक आवश्यक है।

यदि माता-पिता आदेश देने के बजाय बच्चों के मन की चिंता समझें और यदि युवा भी अपने माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करें तो आधी दूरियाँ स्वयं समाप्त हो सकती हैं।

किसी भी पीढ़ी के पास सारे उत्तर नहीं होते। अनुभव और नए विचार जब साथ चलते हैं, तभी संतुलन बनता है।

 

विवाह न तो केवल परंपरा है और न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न।

विवाह दो व्यक्तियों, दो परिवारों और दो जीवन-दृष्टियों का मिलन है।

 

इसलिए इसमें जल्दबाज़ी भी उचित नहीं और अनावश्यक भय भी नहीं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम विवाह को सामाजिक दबाव से निकालकर संवाद, सम्मान और समानता की नींव पर खड़ा करें।

क्योंकि समय बदलता है तो परंपराएँ भी अपना स्वरूप बदलती हैं। लेकिन उनके मूल मूल्य नहीं बदलते। प्रेम आज भी उतना ही आवश्यक है। विश्वास आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ निभाने की भावना आज भी उतनी ही अनमोल है।

बस अब इन मूल्यों को नए समय की संवेदनाओं और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।

शायद तब विवाह केवल एक सामाजिक संस्था नहीं रहेगा, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के बीच ऐसा संबंध बनेगा जहाँ कोई किसी पर हावी न हो, बल्कि दोनों मिलकर एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनने का अवसर दें।

और शायद यही बदलते दौर के विवाह की सबसे सुंदर परिभाषा भी है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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