सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘राधेय’।)
☆ मंजिरी साहित्य # १५ ☆
कविता – राधेय ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, कल मुझे भी मरना है l
वध तो होगा ही है मेरा, अब फिर क्यूँ पीछे हटना है ll
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भविष्य कहेगा मित्रता में, क्यों दिया दुर्योधन का साथ?
वचन बद्ध था रहा सदा मैं, सभी अपनों का छूटा हाथ ll
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रश्मिरथि होकर भी जग में, बहुत हुआ बदनाम l
क्या गुनाह था माधव मेरे, नहीं मिला पाण्डु पुत्र नाम ll
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था अर्जुन से शूरवीर पर, गुरु अहम ने किया दूर l
धर्म अधर्म के बीच धनंजय, आपका व्यवहार रहा सदा ही क्रूर ll
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माता कुंती ने ममता की, छाँव कभी न डाली थी l
पांचो पुत्र रहे सदा सलामत, यही कसम उन्होंने खाली थी ll
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आज धंस गया भू में पहिया, परशुराम का श्राप धरे l
तभी केशव ने आज्ञा दी थी, पार्थ गांडीव तीर भरे ll
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धराशायी ये सूत पुत्र था, करके मैदिनी का आलिंगन l
सूर्यदेव भी देख वत्स को, अस्ताचल करते चिंतन ll
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कहती हूँ जागो जगवालों, बच्चों को इतिहास सुनाओ l
सुर्य पुत्र की सुनो कहानी, क्या था राधेय यह बतलाओ ll
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कहती हूँ अद्धभुत वीर तुम, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें l
द्रवित हुआ है मन मेरा, सदा करूँ मैं नमन तुम्हें ll
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




