डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।

अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।

अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”

साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—

“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”

अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।

साक्षी की आवाज़ काँप गई-

“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”

कमरे में सन्नाटा था।

अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।

“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”

साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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