डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा आत्म-बोध।
☆ लघुकथा – आत्म-बोध ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त और ऐश्वर्यवान प्रसन्ना के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि एक दिन अचानक उसके जीवन से शांति ग़ायब हो गई। उसकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गई। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर शांति उसे बिना बताए कहाँ छोड़कर चली गई है। आज के माहौल को देखते हुए बार-बार उसके मन में यह संदेह पैदा हो रहा था कि कहीं किसी दुष्ट-दुर्जन ने उसका अपहरण तो नहीं कर लिया है।
प्रसन्ना ने थाने में जाकर शांति के ग़ायब हो जाने की रपट लिखवाई। पर जैसाकि आमतौर पर होता है पुलिस ने उसको ढाढ़स बँधाते हुए आश्वस्त किया कि हम अपनी ओर से शांति को खोजने का भरसक प्रयास करेंगे और जैसे ही कहीं से कोई सूचना मिलेगी श्रीमान को सूचित कर दिया जाएगा। दूसरी ओर प्रसन्ना ने अपनी ओर से जान-पहचान वालों और नाते रिश्तेदारों को फ़ोन कर शांति के बारे में पूछताछ की, अख़बारों में शांति के ग़ायब हो जाने के इश्तहार छपवाए, पर शांति का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। उधर साल भर बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से कोई सूचना नहीं मिली।
आखिर एक दिन थक-हारकर प्रसन्ना ने ईश्वर के समक्ष अपनी ओर से शांति की खोज के तमाम हथियार डाल दिए। उसी रात प्रसन्ना के सपने में शांति प्रकट हुई और उससे बोली- ‘मेरे प्रिय प्रसन्ना ! मेरा ना तो किसी ने अपहरण किया था और न ही मैं तुम्हें कहीं छोड़कर गई थी। पर जब मैंने देखा कि तुम मुझे और अपने बच्चों को छोड़कर अपने नाम, व्यवसाय, प्रसिद्धि और धन-दौलत को प्यार करने लगे, बात-बात पर मुझे अपमानित और उपेक्षित करने लगे, तो दरअसल तुम्हारे भीतर आत्मबोध जाग्रत हो इसलिए कुछ समय के लिए तुमको अकेला छोड़कर अंतर्ध्यान हो गई थी ताकि तुम्हें इस बात का अहसास हो सके कि जीवन में धन-दौलत अहम है अथवा अपने आत्मीय और सुख-शांति…!
प्रसन्ना मैं चाहती हूँ कि तुम सदैव प्रसन्न रहो। तुम कल भी मेरे आत्मीय थे, आज भी हो और आगे भी रहोगे। मैं अनादि काल से तुम्हारे ह्रदय में मौजूद हूँ। वो तो एक तुम ही थे, जो मुझे विस्मृत कर बैठे थे।
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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