डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा मुझे चाँद चाहिए।
☆ लघुकथा – मुझे चाँद चाहिए ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
रामा की मम्मी की मम्मी, उसकी मम्मी की मम्मी यानी पीढ़ियों से एक ही ख़ानदानी बड़े साहब के घर चूल्हे-चौके का काम कर रही है…!
रामा की उम्र यही कोई पंद्रह-बीस के क़रीब होगी। एक दिन वह अपनी मम्मी से बोला- ‘मम्मी…! मम्मी…! मेरे दोस्तों का कहना है कि तुम जिन साहब के घर पर काम करती हैं उनका बेटा जरा खिसका हुआ है।’
और यह भी कह रहे थे कि वह सड़क पर खड़ा होकर कपड़े फाड़ने लगता है। आते-जाते लोगों को गाली-गलौज करने लगता है। एक दोस्त का तो यहाँ तक कहना है कि अगर उसके मन में आ जाए तो वह राह चलते मुसाफ़िर को पत्थर उठाकर मार देता है। ‘मम्मी…! क्या राजा भैया… घर में भी ऐसे ही हरकतें करते हैं।’
‘अरे! नहीं रे रामा…! मुझे तो उसमें कभी कोई ऐसा-वैसा पागलपन देखने में नहीं आया। इतना भर सुनने में आया है कि जबसे उसकी ख़ानदानी जागीर पर किसी दूसरे ने क़ब्ज़ा कर लिया है, तब से वह अक्सर बहकी-बहकी सी बातें करता रहता है। और हाँ! अक्सर अपनी माँ से ‘मुझे चाँद चाहिए… मुझे चाँद चाहिए… की ज़िद करते हुए जरूर सुना है…!’
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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