डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – असली मालिक…!
☆ लघुकथा ☆ असली मालिक…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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माननीय महोदय सत्ता की कुरसी पर क्या विराजे कि अपने आपको मालिक मान बैठे, पर पुलिस और माननीय के बीच बड़ी देर तक चली लुका-छुपी के बाद आख़िरकार माननीय गिरफ्तार कर ही लिए गए।
अगली सुबह पुलिस माननीय को लेकर अदालत पहुँची और ‘माय लार्ड’ से अर्ज किया कि माननीय पर आरोप है कि इन्होंने सरकारी ख़ज़ाने का अपने हित में बेजा इस्तेमाल किया है। अतः कृपाकर माननीय पूछताछ के लिए हिरासत में रखने की अनुमति प्रदान की जाए। ‘माय लार्ड’ को मामला संगीन लगा और उन्होंने तत्काल कस्टडी प्रदान कर दी।
पुलिस पहले से ही माननीय पर ग़ुस्साए बैठी थी…! चूँकि उसको अपने विश्वसनीय और गुप्त स्रोतों से पता चल चुका था कि माननीय द्वारा डकैती की पूरी रकम डकारी जा चुकी है। अतः पुलिस के लिए माननीय के भेजे का ऑपरेशन कर उनके दिल में दफ़्न सारे राज उगलवाना ज़रूरी था।
माननीय पद और परिवार के मद में बुरी तरह अँधे हो चुके थे। वह इस सच्चाई को भूल बैठे थे कि समय सदा-सर्वदा किसी के लिए एक सा नहीं रहता है। वहीं वैसे भी, मौजूदा दौर टेक्नोलॉजी है। चोरी हो या फिर डकैती ज़्यादा समय के लिए राज़ को परदे में छुपाकर रखा जाना मुमकिन नहीं है।
चूँकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। जिसमें सत्ता किसी के बाप की जागीर होती है, न इसमें कोई राजा-महाराजा होता है बल्कि जनता ही देश की असली मालिक होती है। उसको जब भी मौका मिलता है वह बड़े से बड़े पदाधिकारी को उसकी औक़ात दिखा देती है। जिसे वह सर-माथे पर बिठाती है, उसे समय आने पर कचरे की डस्टबीन के हवाले कर देती है।
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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