डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
रीमा को विदेश की प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। यह उसके वर्षों के परिश्रम का सपना था। लेकिन उसी समय उसके पिता की तबीयत बिगड़ गई। माँ की आँखों में चिंता थी और पिता के चेहरे पर मुस्कान, जो मानो कह रही थी-“तुम जाओ, हम संभाल लेंगे।”
रीमा का मन भावनाओं और वास्तविकता के बीच झूलता रहा। एक ओर अपने सपनों का भविष्य था, दूसरी ओर अपनों का वर्तमान।
उसने कुछ दिन रुकने का निर्णय लिया। पिता का इलाज करवाया और परिवार को संभाला। कुछ महीनों बाद उसने फिर आवेदन किया। इस बार उसे पहले से बेहतर अवसर मिला।
नियुक्ति-पत्र हाथ में लेकर जब वह पिता के कमरे में पहुँची, तो उन्होंने बस उसका हाथ थाम लिया। दोनों की आँखों में न कोई शिकायत थी, न कोई सफाई-सिर्फ़ एक गहरा सुकून था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। रीमा ने चुपचाप वह पत्र मेज़ पर रखा और पिता के कंधे पर सिर टिका दिया।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





