☆ लघु उपन्यास  ☆ बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

मेरे महान देश का एक गौरवशाली प्रांत।

उसी प्रांत में, पर्वतों से घिरा एक खूबसूरत-सा शहर।

शहर से थोड़ा हट कर, एक तंग, बलखाती नहर के किनारे बसा, ऊंचा-नीचा-सा गांव।

उसी गांव की सीमा से थोड़ा इधर, एक बड़ा कारख़ाना।

बड़े कारख़ाने में कार्यरत, दो-ढाई हज़ार रंगबिरंगे कर्मचारी और अधिकारी।

उन कर्मचारियों और अधिकारियों के, सपरिवार रिहाइश के लिये, चार वर्ग-किलोमीटर में फैली,

फैक्टरी-एस्टेट।

उसी एस्टेट के तीन भागः-

एक ओर, बैंगलो एरिया, केवल राजपत्रित अधिकारियों के लिये।

दूसरे कोने पर, वर्कर काॅलोनी और कुली कैम्प, साधारण कामगार, मज़दूरों आदि के लिये।

उन दोनों के मध्य, स्टाफ़-क्वार्टर्स, दो पाटों के बीच, लगातार पिसने वाले सुपरवाइज़रों के लिये…

≡ एक ≡

आशी की झुंझलाहट देख, हँसी आने को होती है। किंतु हँस पड़ना मज़ाक नहीं, क्योंकि मेरे बिना हँसे ही कह डालती है।

“कितनी बुरी बात है!”

उस तड़प में, एक कृत्रिम सी-पीड़ा हो जैसे!

मैं गम्भीर और अनमना-सा उसकी ओर ताकता रहता हूं। फिर पूछ ही लेता हूं, “क्या बुरी बात है मैडम?”

“मैडम-वैडम कुछ नहीं! जल्दी से उठ कर नहा लीजिये, वरना नाश्ते से हाथ धो बैठेंगे।”

“मैं दरअसल, एक बात सोच रहा था।” मैं कुछ कहने लगता हूं, मगर वह मुझे बीच में ही टोक कर कहती है, ”सिर्फ़ एक बात?…

बाई दि वे, आप सुबह से इस नेक काम सोचने के अलावा कर ही क्या रहे हैं? भई, छुट्टी का यह मतलब तो नहीं, कि आदमी दिन भर बिस्तर में पड़ा सोचता ही रहे। उसे उठकर कुछ तो करना ही चाहिये।”

मैं मुस्करा कर कह देता हूं, ”जब तुम अपनी बातचीत मंे, चाहिये शब्द का प्रयोग करती हो, तो जिस को कुछ भी पता न हो, उसे भी मालूम पड़ जाता है, कि तुम एक लेडी टीचर हो!”

मेरी बात सुनकर वह हँसती हुई एक निर्णय-सा सुना देती है, ”साढ़े ग्यारह तो हो ही गये। अब नाश्ते की बात भुलाकर, सीधे लंच की ही चिंता करूं। आप आराम से पड़े, अपने सोचने के कार्यक्रम को जारी रखिये। कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा… अब मेरी तरफ़ ऐसे मत देखिये, चाय का एक कप और बना लाती हूं।”

काफी दिन, बल्कि कहना चाहिये, कई वर्ष बाद, अर्चना का पत्र मिला है। इस दौरान, कितनी ही घटनाएं घट गई। कुछ मेरे साथ, जो अच्छी तरह मालूम हैं। कुछ उधर, जिन के बारे में बहुत कम मालूम है।

पत्र उठा कर, फिर पढ़ने लगता हूं… मैं कितने दिनों से आपको पत्र लिखने की सोच रही थी। लिखा भी कई बार। किंतु हर बार, पत्र अधूरा ही रहा और चिथड़े होकर, हवा में उड़ता हुआ, जाने कहां जा पहंुचा। मगर आज तो निश्चय कर के ही बैठी हूं। इस पत्र को पूरा करने के बाद, आज ही डाक के हवाले कर देना है… मैं भी कितनी स्वार्थी हूं! यह निर्णय पहले भी तो ले सकती थी। स्वार्थी शायद हूं ही! सीधे-सीधे ही लिख दूं, कि अरूणा के विवाह की तिथि निश्चित हो गई है। लड़का इंजीनियर है। स्वभाव का हँसमुख है। घर में अन्य सभी भी अच्छे स्वभाव के हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि लेन-देन का कोई भी चक्क्र नहीं… अगले महीने की सोलह में, दिन ही कितने रह गये! आप ही सोचिये, कैसे कर पाउंगी मैं यह सब? क्या यह संभव है, मुझ अकेली के लिये? मां, बाबू जी, सभी का काम, मुझे ही तो देखना होगा। मगर अनिल भइया, उनके स्थान पर तो आप ही को खड़ा होना होगा… मैं आप पर कोई बोझ नहीं डालूंगी और न कोई उलझन ही होगी। बस, आप इस मौक़े पर पहुंच ज़रूर जाना, वरना लोग कहेंगे, इन बेचारी अभागी लड़कियों का कोई भी अपना नहीं… एक बात और… अकेले नहीें आना… अर्चना।

चाय का प्याला लिये, वह फिर सामने मौजूद है और कह रही है, ”पत्र को बार बार और लापरवाही से पढ़ने के बजाये, एक ही बार जो ढंग से पढ़ लिया जाये!”

मैं उसकी बात का उत्तर न देकर, प्याला थाम लेता हूं।

चाय बहुत गरम है। घंूट भरते ही, तालू जल गया है। बिल्कुल उसी तरह, जैसे उस दिन अरूणा हलवे की प्लेट लेकर आई थी और…

अरूणा का विवाह हो जायेगा। मगर अर्चना? और वह मीता? मीता के अंकल?… सफ़ेद साड़ी में लिपटी और नंगे फ़र्श पर सीधी लेटी आंटी… उस बडे़े अफ़सर की बड़ी सी कोठी…

भयानक शोर… मशाीनों की निरंतर खड़खड़ाहट… कारीगर और मिस्त्री लोगों की हठधर्मी और अश्लील मज़ाक… यूनियन वालों के मज़दूर एकता और इन्क़्लाब जिं़दाबाद के बुलंद होते नारे… बड़े साहब के अजीबो-ग़रीब आदेश और छोटे साहब के जान लेवा अन्दाज़… एक एक दिन का अवकाश स्वीकृत कराने के लिये, घंटों चलते तकरार… यह अब तक क्यों नहीं हुआ? और वह काम कब तक पूरा होगा?… आप लोग कुछ करते क्यों नहीं? आप लोग तो किसी भी लायक़ नहीं!

उस दिन, लोक राम सामने आ खड़ा हुआ था। उसके इस तरह आने का अकसर एक ही अर्थ होता था।

“फिर बुलाया है?” मैंने जानते हुए भी पूछा।

“जी, फ़ौरन पहुंचने को कहा है।”

“कोई ख़ास बात?”

“बात तो नहीं मालूम। मगर मूड क़ाफ़ी ख़राब लगता है। दो-तीन को अभी-अभी झाड़ चुके हैं।”

मैं रजिस्टर छोड़, उठ खड़ा हुआ। कैबिन से बाहर निकला। लगभग सभी मशीनें चल रही थीं। किंतु कितने ही वर्कर अपनी मशीनें चलती छोड़ और चार-चार पांच-पांच के झंुड बना कर, गप्पों में व्यस्त थे। मुझे आता देख, उन की गतिविधयों में कोई भी व्यवधान नहीें पड़ा। केवल तीन चार ही, अपनी मशीनों के पास जा खड़े हुए।

तभी, अनिल, अपनी मशाीन बंद करके, ज्यूट से हाथ पोंछता हुआ मेरी ओर लपकता-सा आया और बोला, ”ऐसे तो काम नहीं चलेगा।”

मालूम था, मैं इस समय ज़रा सा भी रूक गया, तो कुछ अन्य वर्कर यहीं आ पहुंचेंगे। तब आध पौन घंटे से पहले तो क्या ही छूट पाउंगा!

अतः चलते-चलते ही कहा, ”मुझे मैनेजर साहब ने बुलाया है, लौटकर तुम्हारी बात सुनूंगा।”

मैनेजर, अर्थात नरेन्द्र मोहन के सामने, चार अधीनस्थ अधिकारी, अपराधियोें की तरह, सिर झुकाये खड़े थे। सामने खाली पड़ी कुर्सियों पर, शायद किसी को भी, बैठने का साहस नहींे हो पाया था। संभवतः ये सभी महानुभाव, सामने तन कर बैठे मैनेजर से, अच्छी खासी झाड़ खा चुके थे।

”ठीक है, आप लोग तशरीफ़ ले जा सकते हैं।” नरेन्द्र मोहन ने, एक ही बार में, हाथ हिलाकर, उन्हें विदा कर दिया।

अब मेरी बारी थी। उसने मुझे, ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर तक देखा। जैसे, वह अजायबघर में रखी कोई विशेष चीज़, पहली बार देख, चकित हुआ जा रहा हो।

“कहिये श्रीमान! कैसे तकलीफ़ की?”

“सर, आपने मुझे बुलाया था।”

“ओह!” उसकी वाणी में चिरपरिचित कटुता और व्यंग्य की मिली जुली झलक थी।

“आपके फ़ोरमैन साहब आये हैं, या आज भी अपने दौलत-ख़ाना पर पड़े, आराम फ़रमा रहे हैं?”

“सर, उनकी चोट, अभी तक ठीक नहीं हुई।”

“हां… और आप की चोट? सुना है, चोट खाने में आप भी काफ़ी माहिर हैं।”

“नहीं सर, मुझे तो कोई चोट नहीं लगी।”

“ख़ैर, नहीं लगी, तो लग जायेगी। हां, यह बताइये, मैंने जो पचपन जाॅब बनाने के लिये कहा था, बन गये?”

“वे तो नहीं बने सर।”

“क्यों…? कब तक बन पायेंगे?”

“सर, अभी तो वे शुरू भी नहीं किये गये।”

“क्या…?” वह बुरी तरह गुर्राया।

“सर, जितने काम इस वक़्त मशीनों पर चढ़े हैं, सभी अर्जेंट हैं। उनमें से किसी को भी, दो दिन तक, मशीन से उतारना पाॅसिबल नहीं। फोरमैन साहब ने यही कहा था सर।”

“समझ में नहीं आता, आप को किस अक़्लमंद ने सुपरवाइज़र बना दिया!”

“सर, वोह…।”

“नो… नो आर्गूमेंट्स! मैं कुछ नहीं जानता, शाम तक वे पचपन काम बन जाने चाहिये! समझे?”

“सर, कौन सा काम बंद करा दूं?”

“यह मुझे बताना पड़ेगा? मिस्टर, नौकरी करनी है, तो ठीक से करो, वरना… तुम्हारी ए0 सी0 आर0 अभी गई नहीं, यहीं रखी है मेरे पास!”

मैनेजर नरेन्द्रमोहन ने ए0 सी0 आर0 ख़राब करने की फिर धमकी दी थी। उसके द्धारा, एक-दो उल्टे सीधे शब्द लिख देने से ही, मेरा कैरियर तबाह हो सकता था… नाॅट रिलाइवल… प्रमोशन, नाॅट येट आदि कुछ भी लिख देना मामला चैपट करने के लिये पर्याप्त था।

बहुत पहले से ही, वह मुझ से चिड़ा हुआ था। तभी से, जब मैं नौकरी के लिये, इस संस्थान में टेस्ट देने के लिये आया था। वह उस समय एसिसटेंट मैनेजर के पद पर था। उसी ने हम बत्तीस मेें से, पांच को चुनना था।

सुबह से शाम पांच बजे तक, उसने हमें यों ही धूप में बिठाये रखा। फिर कहा, ”आप लोग कल आइये।”

चलने लगे, तो हमें रोक कर, वह बहुत ही धीमी आवाज़ और राज़दारी के लहज़े मेें कहने लगा, ”देखो, कल आप लोगों को प्रेक्टिकल टेस्ट के लिये, एक जाॅब बनाने को दिया जायेगा। जो काम बनाना है, उसकी ड्राइंग भी आपको दे दी जायेगी। ड्राइंग को अच्छी तरह देख कर फ़ैसला कर लेना। सोच लेना, उस जाॅब को तुम बना भी सकते हो या नहींे। ऐसा न हो, कि मशीन ही तोड़ डालो। चलो, मशीन की भी कोई बात नहीं, अपना हाथ पैर कटवा लिया, तो हमारे लिये भी आफ़त खड़ी हो जायेगी। वैसे भी, अगर कुछ काम आता जाता न होगा, तो अपना कीमती वक्त बरबाद करोगे और हमें अलग परेशान करोगे!”

उसने यह बात, पान चबाते हुए, कुछ ऐसे ढंग से कही, कि अगले दिन, बत्तीस में से, केवल पंद्रह लड़के, टेस्ट के लिये पहुंचे।

कच्चे इस्पात का एक-एक टुकड़ा और रेती, सभी उम्मीदवारों को थमा दिया गया और कहा गया, कि धातु को शिकंजे में कस कर और सीधी रेती चला कर, प्रत्येक ओर से 90० के पक्के कोण बनाते हुए, दो इंच का घन तैयार करना है।

हम सभी, रेतियां चलाने लगे। पांच-सात मिनट ही हुए थे। कि वह आ पहुंचा और आंखें फैला कर बोला, ”वाह! क्या बात है! यह फ़ाइलिंग हो रही है? कहां से सीख कर आये आप लोग फ़ाइल चलाना?”

सभी उम्मीदवार पसीने में भीग गये और एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।

“देखो, मैं बताता हूं, फ़ाइल कैसे चलाई जाती है।” इतना कह कर, उसने एक लड़के के हाथ से रेती पकड़ ली। उसका हैंडिल घुमा कर दूसरी ओर किया और उल्टी रेती चलाने लगा।

”कुछ समझे?… ऐसे चलाओ फ़ाइल।”

वह गम्भीर लग रहा था। किंतु मुझे, मेरे एक परिचित ने पहले ही समझा रखा था, कि वह मैनेजर, सीधे लोगों को उल्टी दिशा दिखाने में निपुण हैं। उसने जिससे कुछ लिया दिया होता है, वह उसे पहले ही होशियार कर देता है और शेष सभी को, उल्टे रास्ते पर घुमा देता है।

चुनांचे, मुझे और एक अन्य लड़के के अलावा, सभी उल्टी रेतियां चलाने लगे। दो मिनट के तमाशे के बाद ही, वह ऊंची आवाज़ में बोला, ”गुड! वेरी गुड! ये तेरह लड़के वाक़ई बहुत क़ाबिल हैं। मगर इनकी योग्यता के मुताबिक़, इस फैक्टरी में तो कोई भी काम नहीं है। इन्हें कहीं और जाकर, किसी बड़ी पोस्ट के लिये कोशिश करनी चाहिये।”

फिर उसने दरबान को बुला कर आदेश दिया, ”इन तेरह शरीफ़ आदमियों को साथ ले जाकर, परले गेट तक पहुंचा दो।”

तब, हम दो लड़के ही, पूरे लाॅट में से नौकरी पर लिये गये थे। किंतु उस समय, मैंने उल्टी रेती क्यों नहीं चलाई थी, वह इसी बात पर चकित और अप्रसन्न था।

उसके बाद भी, जब मैंने वर्कर से सुपरवाइज़र बनने के लिय परीक्षा में बैठना चाहा, तब उसने तमाशा दिखाया था।

“आप को यह किसने नेक राय दी सुपरवाइज़र बनने का सपना देखने की?”

”सर, राय तो किसी ने नहीं दी। दूसरे लड़के आवेदन दे रहे थे, मैंने भी दे दिया।”

“मतलब, आप सिर्फ़ भेड़चाल में शामिल हुए। अपने दिमाग़ से बिल्कुल काम नहीं लिया!”

”सर, मैं तो…।”

“देखो, तुम्हारे भले के लिये कह रहा हूं… उस बाबूगिरी के काम में कुछ नहीं रखा। अब तक यहां जितना काम सीखा है। कुर्सी पर बैठकर, सभी भूल जाओगे। मेरी मानो, तो जाकर अपनी एप्लीकेशन वापिस ले लो।”

अच्छा यही हुआ, कि वह उस दौरान, एक महीने की छुट्टी पर चला गया और उसकी अनुपस्थिति में, मैं बड़ी आसानी से, सुपरवाइज़र चुन लिया गया।

किंतु उसके बाद भी उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह सड़क पर चलते-चलते ही, मुझे रोक लेता और शुरू हो जाता… कितने साल हो गये, फैक्टरी में काम करते? बताइये तो, माइक्रोमीटर में कितनी चूड़ियां होती हैं?… हाइटगेज क्या बला होती है?… पिच और लीड में क्या फ़र्क होता है? इन्टरलाॅकिंग कटर किस काम आते हैं? चूड़ियां काटने के लिये, गियर का सेट कैसे चुना जाता है? आप्टिकल पाय कैसे तैयार किया जाता है?

बहुत दिन बाद पता चला, कि वह इस प्रकार मुझे ही नहीं, अपितु बहुत से ऐसे लोगों को, जिन्हें वह नापसंद करता था, परेशान करता ही रहता था। जब तक कि सामने खड़ा व्यक्ति, पूरी तरह नर्वस होकर हथियार न डाल दे, वह प्र्रश्न पर प्रश्न दाग़ता ही चला जाता था और वह उस व्यक्ति को बार बार एहसास दिलाये जाता, कि वह महज़ एक नाकारा गधा है, जो फैक्टरी से मुफ़्त का वेतन बटोर कर, पूरे राष्ट्र को हानि पहुंचा रहा है!

मैं वर्कशाप में लौट कर आया, तो देखा, एक सौ चार में से, केवल तीस-बत्तीस मशीनों पर ही वर्कर काम कर रहे हैं। शेष सभी, संभवतः फ़ोरमैन साहब के अवकाश पर होने का जशन मना रहे थे।

सोहन लाल टर्नर, एक बहुत अच्छा और अनुभवी कारीगर था। वह वर्कर लोगों के बीच, ‘उस्ताद’ के रूतबे से पूजा जाता था। इस समय वह भी, अपनी मशीन छोड़, दस-बारह शार्गिदों की टोली के दरम्यान खड़ा, शेरो शायरी में मशग़ूल था।

मुझे समीप आते देख, कुछ वर्कर खिसकने लगे। किंतु उस्ताद ने उन्हें हाथ के संकेत से रोक लिया और अपने चेहरे पर शानदार क़िस्म की मुंस्कराहट लाकर, मुझे सम्बोधित करते हुए बोला, ”लीजिये साहब, आप भी एक ताज़ातरीं शेर मलाहिज़ा फ़रमाइये। अर्ज़ किया है, किः-

बस एक ही उल्लू काफ़ी था बरबाद गुलिस्तां करने को

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा

मैंने उसकी लम्बी मंूछों की ओर देखते हुए पूछा, ”यह शेर आपने लिखा है? मैंने तो इसे थोड़े दिन पहले, एक मुशायरे में सुना था।”

वह मुस्करा कर बोला, ”किसी ने चुरा लिया होगा!”

मैंने जलभुन कर कहा, ”बाई दि वे, आप की शेरोशायरी का यह दौर कब तक चलेगा?”

“बस, कैन्टीन से चाय आने ही वाली है। उसके बाद तो आप जानते ही हैं, मशीन होगी और हम होंगे।”

मैंने कहा, ”एक बात नोट कर लीजिये। आज शाम तक, वे पचपन स्क्रू, नई ड्राइंग के हिसाब से हर हालत में बन जाने चाहिये।”

“शाम तक?… न बन सकेें, तो?” उसने मुंह बना कर पूछा।

“तब मैनेजर एन0 मोहन साहब, अपना ताज़ा कलाम पेश करेंगे, जो ख़ास तौर पर आप की खि़दमत में होगा।”

एक कोने में, जहां चार-पांच मशीनें, मरम्मत के लिये पड़ी थीं, उनके पीछे बैठे कुछ आदमी, जुआ खेल रहे थे।

“शरम आनी चाहिये आप लोगों को!” मुझ से बिना कहे न रहा गया। वे झटपट, ताश के पत्ते और रेज़गारी, जेबों मंे ठोंस, उठ खड़े हुए।

“डयूटी पर भी जुआ? कितनी बुरी बात है!” मैंने कृष्ण की ओर देखते, फटकार लगाई। मगर वह कुछ महसूस करने के बजाये, तन कर खड़ा हो गया और कहने लगा, ”हां साहब, हम तो जो भी करें, बुरा है। छोटे लोग हैं न, इसलिये बुरा है! आप बड़े लोग, सारी सारी रात, उधर बड़ी क्लब में जो कुछ किया करते हैं, वह तो धर्म और पुन्य का काम होता होगा!”

“देखो, छुट्टी के बाद तुम लोग कुछ भी करो, मुझे कोई मतलब नहीं। मगर यहां…।”

ग़ौर किया, इसी दौरान दस बारह वर्करों का झंुड, मुझे घेरे खड़ा है।

“आप लोग अपनी अपनी मशीन पर जाकर काम शुरू कीजिये।” मैंने कुछ सख्ती से कहा। किंतु तभी, चाय वाला, एक हाथ में चाय का ड्रम और कंधे पर समोसे का डिब्बा लटकाये आ पहुंचा और सभी वर्कर, अपना अपना कप या गिलास उठाये, किलकारियां सी मारते हुए, चाय वाले की ओर भाग खड़े हुए।

मैं पुनः अपनी सीट पर आ बैठा और इस महीने, फिटिंग गु्रप में कितना काम हो चुका है, हिसाब करने लगा। देखा, कुछ फिटरों ने इस महीने में, बहुत ही कम काम अब तक किया है। मगर वे लोग तो कम करें या अधिक, उन्हें पूरा वेतन चाहिये। यही नहीं, पूरे वेतन के अलावा, कम से कम पचास प्रतिशत, पीस वर्क का लाभ भी हर हालत में मिलना चाहिये। नहीं मिलेगा, तो यूनियन वाले आ धमकेंगे और यहां मेज़ पर मुक्का मार कर दहाड़ेंगे, ”आप ग़रीब मज़दूरों का शोषण करने पर तुले हैं। हम ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे।”

“मगर इन आदमियों ने, पूरा दिन काम भी तो नहींे किया।”

“अरे, आप अपना टाइम भूल गये, इधर कुर्सी पर बैठते ही!”

 

अनिल आ खड़ा हुआ।

“कहिये साहब, अब तो टाइम है आप के पास?”

“बोलो?”

“बोलना क्या है, इस सेक्शन से मेरा ट्रांस्फ़र करा दीजिये।”

“यहंा क्या तकलीफ़ है?”

“इस सेक्शन में, अनुशासन नाम की तो चीज़ ही नहीं रह गई है। जो जिस के जी में आता है, करता है। दिन भर चाय उड़ती हैैै। बीड़ियां फंूकी जाती हैं, मुशायरे होते हैं और जगह जगह जूए के अड्डे बने हैं… यह सब क्या है?”

मैंने कहा, ”मिस्टर अनिल, क्या आप इस फैक्टरी के नये महाप्रबंधक नियुक्त हुए हैं, जो इस तरह अनुशासन हीनता के ग़म में घुले जा रहे हैं?”

वह निराश सा होकर बोला, ”बडे़ ही अफ़सोस की बात है!”

मैंने कहा, ”बैठो और बैठकर इतमिनान से अफ़सोस करो।”

किंतु वह खड़ा ही रहा और बोला, ”आप भी दूसरे स्टाफ़ की तरह, वर्करों को हीन समझते हैं!”

मैंने हंस कर कहा, ”अरे भई, मैंने तो बैठने के लिये कहा है।”

वह समीप पड़े लकड़ी के स्टूल पर बैठ गया, तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की। कहा, ”अनिल, तुम बस अपना काम किये जाओ।”

“अरे ये लोग?”

“ये लोग तो यों ही चलेंगें। सच मानो, इस देश को, कोई भी नहीं सुधार सकता।”

“न जाने क्यों, मुझे आप से हमदर्दी होने लगी है!”

“अब शायद तुम ख़ुद, मुझे हीन समझने लगे हो!”

“अच्छी बात! आप जब बात को समझना ही नहीं चाहते, तो यहां बैठ कर क्या करूंगा!”

वह उठने लगा। मगर मैंने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया।

“बात क्या है?” मैंने धीरे से पूछा।

“आप को शायद मालूम नहीं, कृष्ण, नरेन्द्र मोहन का आदमी है।”

“मालूम है।”

“मगर यह मालूम नहीं होगा, कि इस फैक्टरी में एक षड्यंत्र रचा जा रहा है।”

“षड्यंत्र?”

“मुझे डर है, कहीं आप भी इसका शिकार न हो जायें।”

“वैसे मामला क्या है?”

“मैं शाम को आप से मिलूंगा।” कह कर वह उठ खड़ा हुआ। वह कैबिन से बाहर निकला ही था, कि कोई वर्कर, मशीनों की ओर से चिल्लाया, ”साला चमचा, आ गया अपने बाप को तेल लगा कर!”

 

षड्यंत्र! कैसा षड्यंत्र होगा, जिसका, मैं स्वयं भी शिकार हो सकता था? मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर लोगों को मुझे से क्या शिकायत है? क्यों नाराज़ हैं वे?

चमचा! मुझे हंसी आ गई। किसी पर, मेरे जैसे मामूली आदमी का ‘चमचा’ होने का आरोप! क्या कहने!

अनिल, एक अच्छा, किंतु बहुत ही भावुक, दुबला पतला सा नवयुवक, बेहद परिश्रमी, दिन भर काम पर ही पिला रहने वाला कामगर। मगर मामूली सी बात पर भी, आवेश में आकर, चेहरा सुर्ख कर लेने वाला एक आदर्शवादी।

उसे ट्रेड टेस्ट में पास कराने में, मैंने सहयोग दिया था, या कहिये, कि उसके कार्य करने का ढंग ही इतना बढ़िया और प्रभावशाली था, कि बिना किसी पूर्व परिचय के भी, मुझे बोर्ड के पास जाकर, उसकी सिफ़ारिश करनी पड़ी थी। नौकरी पर लग जाने के कुछ दिन बाद ही, वह बहुत से पुराने और अनुभवी कारीगरों को भी पीछे छोड़ने लगा था। जिस किसी कठिन कार्य को हाथ में लेते, वे पुराने कारीगर झिझकते, या नख़रा दिखाते, वह आगे बढ़कर, और बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता और जब तक उस जाॅब को पूरा करके, इंस्पेक्शन वालों से पास न करा लेता, वह साँस न लेता। इंस्पेक्शन वालों को भी उस पर पूरा भरोसा हो चला था। अनिल के हाथ से निकला काम है, तो सही हीे होनाा चाहिये।

मगर अनिल के आदर्शवाद से, मैं कभी कभी परेशान हो उठता था… लोगों को शरम भी नहीं आती! ये लोग, बिना काम किये ही, पूरा वेतन ले जाते हैं… इन अफ़सरों को तो गोली से उड़ा देना चाहिये, जो कारों में बैठ, मज़दूर काॅलोनी में जाकर, बच्चों को टाॅफ़ियां बांटने के बहाने, नल से पानी लेती औरतों के वक्ष के उभार देख कर तृप्त होते हैं… अब तो लगने लगा है, कि इस पूरे देश का ही बेड़ा ग़र्क़ होने वाला है! यहां तो हर आदमी को अपनी ही पड़ी है… यहां तो तुरंत सैनिक शासन क़ायम हो जाना चाहिये…।

अनिल कई दिन से ड्यूटी पर नहीं आ रहा था। पता चला, उसे बुख़ार चढ़ा है। फिर पता चला, बुख़ार उतर ही नहीं रहा है। एक दिन सोचा, शाम को उसके क्र्वाटर पर जाकर, पता किया जाये।

मैं बीच का आदमी हूं। फैक्टरी के भीतर और फैक्टरी के बाहर क्वार्टरों के मामले में भी। दायें हाथ, थोड़ा चल कर और मुख्य मार्ग पार करके, अफ़सरों के बंगले हैं और बायें हाथ थोड़ा चल कर और ढलान उतर कर, वर्करों के एक एक कमरे वाले, खपरैलनुमां क्वार्टरों की क़तारें शुरू हो जाती हैं। मेरा क्वार्टर इस दायें और बायें का संगम है। दो कमरे, आगे पीछे, दोनों ओर बरामदे और खुला आंगन। शेष सभी सुविधाएं भी उपलब्ध…।

किंतु वर्कर लोगों के एक एक कमरे वाले क्वार्टर!

केवल एक कमरा, छोटा सा बरामदा, उसी में एक ओर रसोई। पानी के नल और संडास की, बाहर संयुक्त व्यवस्था। जहां लोग क़तारों में खड़े, अपनी बारी की प्रतीक्षा किया करते। पानी की एक एक बाल्टी के, ‘पहले और बाद में’ के प्रश्न पर घंटों गाली गलौज। कितनी ही बार मारपीट की नौबत और कितने ही, जवान होते लड़के लड़कियों की प्रेम कहानियां, यहीं पर जन्म लेतीं और परवान चढ़तीं…।

वर्कर काॅलोनी के क्वार्टर शुरू होते ही, गोबर की दुर्गंध, नथुनों में प्रवेश करने लगी। सड़क किनारे, दरी बिछा कर ताश खेलने वालों में से कुछ ने, चकित सा होकर, एक बार मेरी ओर देखा और पुनः पतों में खो गये। नल पर पानी लेती कुछ स्त्रियों ने जैसे मुझे पहचानने का सा प्रयास किया। फिर मुंह घुमा कर आपस में खुसर पुसर करने लगीं। चार-पांच बच्चे, एक अन्य फटे कपड़े पहने मरियल से बच्चे को दबोचे हुए थे। न जाने वे उसकी चिथड़े हुई निक्कर की जेब से, क्या निकालना चाह रहे थे। एक मज़दूर की गाय, साथ वाले के बगीचे में मुंह मार रही थी और एक स्त्री घंूघट काढ़े और हाथ में लम्बा सा डंडा लिये, गाय पर पिल पड़ने के लिये भागी चली आ रही थी…।

मैंने उस ब्लाॅक में क्वार्टर की संख्या पढ़ी… यही होना चाहिये। बाहर दरवाजे़ के पास, पत्थर के कोयले की अंगीठी, पूरी तरह नहीं जली थी। उसमें से निकलता गहरा काला धुआं, फ़िज़ा मंे फैला जा रहा था।

अनिल की बहन थी, जो भीतर से, पंखा हाथ में लिये, अंगीठी को, पूरी तरह रोशन करने के लिये चली आ रही थी।

“अनिल है?” मैंने पूछा।

उसने हाथ जोड़ नमस्ते की, तो पंखा उसके हाथ से छूटने लगा। मगर ज़मीन पर गिरा नहीं।

“बुख़ार उतरा?” मैंने पूछा।

“ना… कम भी नहीं हुआ… आइये।”

अनिल आंखें बंद किये लेटा था। उसकी मां, ठंडे पानी में भिगो कर पट्टी उसके माथे पर रख रही थी। बोली, ”कल रात तो तबीयत बहुत ही बिगड़ गई थी… अरूणा, कुर्सी ज़रा इधर खिसका दो।”

मैं बैठ गया। एक मिनट, अनिल के तमतमाये चेहरे की और देखता रहा। फिर पूछा, ”दवा कहां से ली?”

“अपने अस्पताल की चल रही है। दवा क्या है, पानी-सा ही घोल कर दिये जा रहे हैं। बीमार ठीक हो तो कैसे!” मां ने निराश-सी होकर कहा।

तभी, अनिल की दूसरी बहन, जो अरूणा से दो ढाई वर्ष बड़ी लगती थी, दवा की शीशी लिये आ पहंुची।

“कौन सा डाक्टर था ड्यूटी पर?” मैंने पूछा।

“चैटर्जी।” वह उदास और थकी सी बोली।

मैंने कहा, ”ऐसा करों, पर्ची मुझे दे दो। डाक्टर चैटर्जी से कहकर, मैं अभी दवा बदलवा लाता हूं।”

“अरूणा…“ बड़ी बहन ने छोटी को आवाज़ दी, ”लैम्प इधर रख जाओ।”

तभी अनिल ने आंखें खोलीं और मेरी ओर देखा।

“आप ने क्यों कष्ट किया?”

“कष्ट कैसा!”

“आप…”

“तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे।” कह कर मैं उठ खड़ा हुआ। चलने लगा, तो अरूणा बरामदे से ही बोली, “थोड़ा रूकिये, चाय बनने वाली है।”

“नहीं, इस समय चाय नहीं।” मैंने कहा।

“मैंने तो चायपत्ती भी डाल दी।”

उसकी अबोधता पर हँसी आने लगी। कहा, ”दूध और चीनी मत डालना। चाय पीने बैठ गया, तब डाक्टर तो मिल चुका। लाओ, वो पर्ची दो।”

अर्चना ने पर्ची दे दी। उसका चेहरा, अनिल से काफी मिलता था।

गम्भीरता, पूरे घर में शायद सबसे अधिक, उसी के हिस्से में आई थी।

“मैं चलंू आप के साथ। पूछने लगी।”

“किस लिये?”

“आपको एक बार फिर, इतना चक्कर लगानाा पड़ जायेगा।”

”उसकी चिंता मत करें।”

“लौट कर तो चाय पी लेंगे न?”

“न पीने वाली तो कोई बात नहीं।” मैंने हंसकर कहा।

अस्पताल से दवा लेकर लौटने और चाय पीकर, अनिल के क्र्वाटर से बाहर निकलने तक घना अंधेरा हो चला था।

दोनों बहनों ने एक साथ हाथ जोड़े। उस समय, उनके चेहरों पर तनाव कुछ कम था। डाक्टर द्धारा बदल दी गई दवा से, भाई के शीघ्र स्वस्थ हो जाने की सम्भावना मेें ही, शायद यह परिवर्तन हुआ था।

मैंने हाथ जोड़ और मुस्करा कर, दोनों बहनों के अभिवादन का उत्तर दिया।

शायद अंधेरे में ही, इधर-उधर से कई नज़रें, मेरे ऊपर जमी थीं। किसी ने ज़ोर से गले को खखारा और बलग़म का बड़ा सा थोबा, मेरे पैरों के समीप दे मारा।

 

क्रमशः…

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी के लघु उपन्यास “बीच का आदमी” का ई-अभिव्यक्ति में धारावाहिक प्रकाशन स्वागत योग्य है।
इसकी पहली किश्त, कथानक की भूमिका तय करने में सफल हुई है। फैक्टरी का माहौल, मजदूरों की दिनचर्या, और मजदूरों और प्रबंधन के बीच में फंसे आदमी की व्यथा के यथार्थ सम्मत और सजीव चित्रण के लिए उपन्यासकार साधुवाद के पात्र हैं।
उपन्यास की अगली किश्तों की उत्सुकता से प्रतीक्षा है..