डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ माँ, सर्वगुण संपन्न सिर्फ बेटियाँ ही क्यों? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
शाम को ऑफिस से लौटी प्रिशा ने देखा, माँ रसोई में खाना बना रही थीं और भाई आरव सोफ़े पर मोबाइल चला रहा था।
“माँ, आप थक गई होंगी। आरव से मदद क्यों नहीं लेतीं?”
“अरे बेटा, उसे कहाँ ये सब काम आते हैं! तू ज़रा रोटियाँ बना दे।”
“माँ, मुझे भी तो ऑफिस से लौटकर थकान होती है।”
“बेटा, लड़कियों को घर के काम आने चाहिए। कल ससुराल जाएगी तो कैसे सँभालेगी?”
प्रिशा मुस्कुराई, “माँ, आरव भी तो कल शादी करेगा। क्या उसकी पत्नी ऑफिस से थककर नहीं लौटेगी?”
माँ चुप हो गईं।
प्रिशा ने पूछा, “माँ, आपने मुझे पढ़ाया, आत्मनिर्भर बनाया, खाना बनाना सिखाया। लेकिन आरव को केवल कमाना ही क्यों सिखाया?”
माँ बोलीं, “हमारे समय में तो यही होता था।”
“माँ, आपके समय में बेटियाँ इतनी नौकरी भी कहाँ करती थीं? जब उनकी ज़िम्मेदारियाँ बदल गई हैं, तो बेटों की क्यों नहीं?”
माँ की आँखें नम हो गईं। बोलीं, “शायद हमने बेटी को हर परिस्थिति के लिए तैयार किया, पर बेटे को दूसरों पर निर्भर रहना सिखा दिया।”
तभी आरव मोबाइल रखकर रसोई में आया।
“माँ, आज रोटियाँ मैं बनाऊँगा। गोल न भी बनीं तो क्या हुआ, सीख जाऊँगा।”
माँ मुस्कुराईं, “काश, यह बात मैंने तुम्हें बचपन में सिखाई होती!”
प्रिशा बोली, “माँ, सर्वगुण संपन्न बहू ढूँढ़ने से पहले सर्वगुण संपन्न बेटा बनाना भी तो ज़रूरी है।”
☆
© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





