श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
कविता
☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆
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मुसल्सल देखते जाना नज़र में इश्क़ का काजल
नहीं होना कभी भी तुम हमारी आँखों से ओझल
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उतरकर आँखों में देखो गिराँखातिर कि गहराई
हजारो हैं वहाँ तूफाँ बरसते है कहीं बादल
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उसी में है रवादारी उसे कमजोर मत समझो
सवारे जो यहाँ गुलशन उसे नादाँ कहें पागल
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नहीं है दोश भी कोई परिन्दे कैद है फिर भी
गिरेबाँ में जरा झाँको कफ़स में बंद है कोयल
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नहीं हिम्मत किसी में थी करे मैला यहाँ दामन
नहीं धब्बा जरासा भी रखा है पाक ये आँचल
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उसे पत्थर समझ बैठा नजर ने दे दिया धोखा
नहीं हीरा समझ पाया कहाँ का जौहरी कायल
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जवानी का ढला सूरज बुढापा पार करना हैं
अकेले हैं वहाँ जाना जहाँ पर ले चले पायल
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मुसल्सल = एकटक, गिराँखातिर = उदासी, रखादारी = सहनशीलता, कफ़स = पिंजरा
© अशोक श्रीपाद भांबुरे
धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.
मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈






