सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा।)

? मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

-1-

करे बसेरा देख लो, सारा विहग समाज।

काटो कानन तुम नहीं, भटके सारे आज ll

भटके सारे आज, करे मानव मनमानी l

आओ हम सब साथ, शपथ हैं लेते बानी ll

कहे मंजिरी आज, वृक्ष है साथी मेरा l

सबको देता लाभ, कीश भी करे बसेरा ll

-2-

रैन बसेरा है जगत, नहीं ठिकाना आज l

जीवन जीते हम सभी, अलग अलग अंदाज ll

अलग अलग अंदाज,  चलें हैं सूनी राहें l

अश्कों से है आज, देख ये भरी निगाहें ll

कहे मंजिरी आज, बढ़े घनघोर अँधेरा l

अंजानी है राह, मिले कब रैन बसेरा ll

-3-

करें बसेरा बाँस पर, बगुलों का परिवार l

करते हैं कलरव मधुर, नीड़ करें तैयार ll

नीड़ करें तैयार, रोज खोजे वे खाना l

योगी का रच ढोंग, लक्ष्य मछली को पाना।।

कहे मंजिरी आज, आस से भरा सवेरा l

बगुला गाता गान, नीड़ में करें बसेरा ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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