श्री हेमंत तारे
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – चलते रहने का हुनर…।)
☆ हेमंत साहित्य # ६८ ☆
चलते रहने का हुनर… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
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लाज़िमी है कि चलते रहें,
हाथ-पाँव हिलाते रहें—
आख़िर ठहरा हुआ पानी
कब तक अपना आसमान सँभालता है?
कुछ न हो,
तो घर की चारदीवारी में ही
क़दमों की आहट बचाए रखें।
सोफ़ा, दीवान, बिस्तर—
ये सब अपने हैं,
मगर हर बार
इनकी बाँहों में सिमट जाना
भी तो ठीक नहीं।
माना, अब तन
साँझ की ढलती धूप-सा
कुछ अधिक ठहरना चाहता है।
उसकी थकान में
उम्र की सच्चाई है,
उसकी माँग में
कुछ भी ग़लत नहीं।
पर हर साँझ को
रात के हवाले कर देना
कहाँ की समझदारी है?
तन की सुनिए,
मगर उसकी हर ज़िद पर
अपनी राह मत बदल दीजिए।
क्योंकि आराम की चादर
कभी-कभी इतनी मुलायम होती है
कि उसके नीचे
चलने की आदत सो जाती है।
और फिर—
बिस्तर बुलाता नहीं,
खींचने लगता है।
इसलिए अभी
क़दमों में थोड़ी-सी धूप रहने दें,
आँगन में कुछ रास्ते बचाए रखें,
देह को पूरी तरह
साँझ न होने दें।
सत्तर-बाहत्तर की इस उम्र में
मंज़िल का सवाल नहीं—
बस इतना काफ़ी है
कि रास्ता पैरों के नीचे
बना रहे।
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© श्री हेमंत तारे
मो. 8989792935
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





