श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी  एक भावप्रवण रचना   “होम करते रहे हाथ जलते रहे.!”)

 

☆ होम करते रहे हाथ जलते रहे.! ☆ 

 

होम करते रहे हाथ जलते रहे.!

हम मगर सत्य के साथ चलते रहे।

 

हर कदम पर दिया प्यार का इम्तिहां।

मुझको पागल समझता रहा ये जहां।।

नफरतों के कुटिल साँप पलते रहे

होम करते रहे हाथ जलते रहे..!

 

एक उम्मीद जलती रही रात-दिन।

बर्फ मन की पिघलती रही रात-दिन।

हर नजर में हमीं रोज खलते रहे।

होम करते रहे हाथ जलते रहे..!

 

ज्यादती कर रही बदनियति आजकल।

बदनुमा है मनुज की प्रकृति आजकल।

आचरण धर्म के हाथ मलते रहे।

होम करते रहे हाथ जलते रहे..!

 

आस-विश्वास का खुद हीआधार हूँ।

मुश्किलों का स्वयं मैं खरीदार हूँ ।

वक्त के साथ ही रोज ढलते रहे।

होम करते रहे हाथ जलते रहे..!

 

@ संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments