डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “बावरे मन” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

बावरे मन! करता फिरे तू मेरा-मेरा,

साथ न आए कोई भी, जब छूटेगा बसेरा।

*

माया के इस मेले में, तू खोया अनजान,

पल भर की है ये दुनिया, झूठा इसका मान।

तन-धन पर अभिमान करे, समझे इसे अपना,

साँस थमेगी एक दिन, टूटेगा हर सपना।

*

जिसे तू अपना कहता, वो अपने में मगन,

दुख की आँधी आए जब, रह जाएगा अकेला मन।

नाम-सुमिरन कर ले अब, यही सच्चा सहारा,

प्रभु बिन कोई नहीं है, जग सारा ही बेगाना।

*

संतों ने समझाया तुझको, जग है सपना-सा,

जो दिखता है आँखों को, वो है बस छलावा।

छोड़ दे ‘मेरा-तेरा’, कर दे मन को सादा,

तेरे भीतर ही बसता है, वो परम-पिता सारा।

*

बावरे मन! अब समझ ले, यही है सच्ची राह,

प्रभु चरणों में मिट जाए, जीवन की हर चाह।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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