श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – प्रकृति…
प्रकृति ने चितेरे थे चित्र चहुँ ओर
मनुष्य ने कुछ चित्र मिटाए,
अपने बसेरे बसाए।
प्रकृति बनाती रही चित्र निरंतर,
मनुष्य ने गेरू-चूने से
वही चित्र दीवारों पर लगाए।
प्रकृति ने येन केन प्रकारेण
जारी रखा चित्र बनाना
मनुष्य ने पशुचर्म, नख, दंत सजाए।
निर्वासन भोगती रही
सिमटती रही, मिटती रही,
विसंगतियों में यथासंभव
चित्र बनाती रही प्रकृति।
प्रकृति को उकेरनेवाला,
प्रकृति के ख़ात्मे पर तुला,
मनुष्य की कृति में
अब नहीं बची प्रकृति।
मनुष्य अब खींचने लगा है
मनुष्य के चित्र..,
मैं आशंकित हूँ,
बेहद आशंकित हूँ..!
© संजय भारद्वाज
(प्रातः 10:21 बजे, 21.7.2019)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




