श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  –  हर समय

 

समय सबसे धनवान है, समय बड़ा बलवान है। समय से दिन है, समय से रात है। जीवन समय-समय की बात है।

समय दौड़ता है। बच्चा प्राय: समय के आगे-आगे दौड़ता है। बच्चे की खिलखिलाहट से आनंद झरता है। युवा, समय के साथ चलता है। वह वर्तमान से जुड़ता है, सुख भोगता है। सुखभोगी मनुष्य धीरे धीरे तन और मन दोनों से धीमा और ढीला होने लगता है। यथावत दौड़ता रहता है समय पर  राग, अनुराग,भोग, उपभोग से बंधता जाता है मनुष्य। समय के साथ नहीं चल पाता मनुष्य। साथ न चलने का मतलब है कि पीछे छूटता जाता है मनुष्य।

मनुष्य बीते समय को याद करता है। मनुष्य जीते समय को कोसता है। ऊहापोह में जीवन बीत जाता है, जगत के मोह में श्वास रीत जाता है। आनंद और सुख के सामने अपने अतीत को सुनाता है मनुष्य, अपने समय को मानो बुलाता है मनुष्य। फिर मनुष्य का समय आ जाता है। समय आने के बाद क्षण के करोड़वें हिस्से जितना भी अतिरिक्त समय नहीं मिलता। मनुष्य की जर्जर काया  द्रुतगामी समय का वेग झेल नहीं पाती। काया को यहीं पटककर मनुष्य को लेकर निकल जाता है समय।

समय आगत है, समय विगत है। समय नहीं सुनता समय की टेर है। जीवन समय-समय का फेर है।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 5.04 बजे, 23.11.2019

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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माया

समय आगत है और विगत भी । समय किसके लिए रुका है ? उसका काम है चलना -सचमुच जीवन समय- समय का फेर है – रचनाकार ने समय की बड़ी सुंदर परिभाषा की है ।

वीनु जमुआर

बी आर चोपड़ा जी द्वारा प्रस्तुत धारावाहिक महाभारत में श्री हरीश भिमानी जी द्वारा उद्धोषित – …मैं समय हूँ… की याद ताजा करा गई….अद्भुत अद्वितीय “संजय दृष्टि”।

अलका अग्रवाल

समय निरंतर अपनी गति से चलता रहता है।पर, मनुष्य की गति उसकी अवस्थाओं के अनुरूप तेज, मध्यम व मंद होती जाती है। सच है, जीवन समय समय का फेर है।समय का सुंदर विश्लेषण संजय जी।??