हेमन्त बावनकर 

☆ ई- अभिव्यक्ति का विशेष आलेख  ☆ “व्यंग्यम स्मृतियाँ” – व्यंग्य विधा :  एक ऐतिहासिक सन्दर्भ ☆

(यह बात सन 2011 की है जब आदरणीय एवं अग्रज सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री श्रीराम अयंगार जी ने अपने ब्लॉग को अपनी प्रिय पत्रिका “व्यंग्यम” के नाम से शीर्षक दिया।  मैं कल्पना करता हूँ कि यदि यह पत्रिका जीवित रहती तो हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा की दिशा कुछ और ही होती। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन पुरोधाओं ने 70 के दशक में अपने श्रम, परिकल्पना और स्वप्नों की आहुती दी उन्हें हिन्दी साहित्य में उचित स्थान सम्मान देना तो दूर, अपितु, इस तिकड़ी के दो जीवित पुरोधाओं को भी हमने भुला दिया। उनके कार्य को उन्हें जानने वाली समवयस्क और वरिष्ठ पीढ़ियों के अतिरिक्त शायद ही कोई जानता है। इस शोधपरक आलेख के लिए अग्रज आदरणीय श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सहयोग के लिए आभार । इस आलेख के माध्यम से मैं आपको व्यंग्य विधा के लिए समर्पित उन तीन नवयुवकों द्वारा रचे इतिहास से अवगत कराने का प्रयास कर रहा हूँ।  )

संस्कारधानी जबलपुर के तीन नवयुवक श्री महेश शुक्ल, स्व रमेश शर्मा ‘निशिकर’ एवं श्री श्रीराम आयंगर ने जनवरी 1977 में संभवतः मध्य प्रदेश की प्रथम व्यंग्य पत्रिका ‘व्यंग्यम’ का प्रथम अंक प्रकाशित किया होगा तब वे नहीं जानते थे कि वे इतिहास रच रहे  हैं।

आज श्री महेश शुक्ल जी सेंट्रल बैंक से सेवानिवृत होकर बिलासपुर में बस गए एवं श्री श्रीराम आयंगर जी इलाहाबाद बैंक से सेवानिवृत होकर बेंगलुरु में बस गए हैं। स्व निशिकर जी का देहांत लगभग 20-25 वर्ष पूर्व हो चुका है।

श्री महेश शुक्ल जी उस समय की याद करते हुए पुराने दिनों में खो जाते हैं। वे गर्व से बताते हैं कि उन्हें जी एस कॉलेज जबलपुर में डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी ने अङ्ग्रेज़ी और श्री ज्ञानरंजन जी ने हिन्दी की शिक्षा दी थी। आज डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी एवं श्री ज्ञानरंजन जी आज भी साहित्य सेवा में रत हैं। डॉ परिहार जी बाद में जी एस कॉलेज से प्राचार्य हो कर सेवानिवृत्त हुए एवं उम्र के इस पड़ाव में आज भी लघुकथा तथा व्यंग्य विधा में सतत लेखन जारी है। मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ जो ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से मुझे भी उनका आशीर्वाद प्राप्त है।  श्री ज्ञानरंजन जी अपनी पत्रिका ‘पहल’ का सतत सफल सम्पादन कर रहे हैं।

अग्रज श्री श्रीराम आयंगार जी के शब्दों में “कुछ करने की जिजीविषा झलकती है और साथ ही असफलता हमें निराश करती है।” वे आज भी उसी ऊर्जा के साथ साहित्य एवं समाज सेवा में लिप्त हैं। जब मैंने उनसे इस बारे में चर्चा करनी चाही तो उन्होने अपने ब्लॉग का एक लिंक प्रेषित किया जो उनके पत्रिका के प्रति आत्मीय जुड़ाव एवं उन मित्रों के संघर्ष की कहानी बयां करती है।

श्री श्रीराम आयंगर जी अपने ब्लॉग के 6 जनवरी 2011 के अंक में लिखते हैं –

“31 वर्षों के बाद मैं अपने इस ब्लॉग को ’व्यंग्यम’ के लिए पुनः समर्पित कर रहा हूँ।  आपने मेरे ब्लॉग के टेम्प्लेट और शीर्षक में बदलाव देखा होगा। अब एक शब्द “वयंग्यम” प्रत्यय दिया है। 2011 की यह पहली पोस्ट हिंदी में एक त्रैमासिक लघु  पत्रिका “व्यंग्यम” को समर्पित है, जो पूरी तरह से व्यंग्य लेखन के लिए ही समर्पित थी। इस पत्रिका का सम्पादन मैं और मेरे जैसी मानसिकता वाले दो लेखक मित्र रमेश शर्मा ‘निशिकर’ और श्री महेश शुक्ला मिलकर करते थे। निशिकार जी का घर ही उनका कार्यालय हुआ करता था।

हिंदी में ‘व्यंग्य’ मेरे दिल के बहुत करीब है, जैसा कि मैं अपने कॉलेज के दिनों से पहले और बाद में अंग्रेजी में व्यंग्य लिख रहा हूं। अक्सर पाठक हास्य विधा को व्यंग्य विधा समझने की गलती करते हैं, लेकिन हम व्यंग्यकार के रूप में दोनों के बीच एक रेखा खींचते हैं। जबकि हास्य विशुद्ध रूप से हंसी और मनोरंजन के लिए है, व्यंग्य हास्य के स्पर्श के साथ गंभीर विचार प्रक्रिया है जो पाठक को सामाजिक और राजनीतिक रूप से और आसपास के समाज में विसंगतियों से अवगत कराता है।

यदि हम 70 या 80 का दशक देखें तो पाएंगे कि व्यंग्य को किसी भी हिन्दी पत्र पत्रिका में अनियमित रूप से फिलर की तरह उपयोग में लाया जाता था। उस दौरान मुंबई से  राम अवतार चेतन द्वारा प्रकाशित ‘रंग चकल्लस’ के अतिरिक्त हिन्दी की कोई भी पत्रिका नहीं थी जो व्यंग्य विधा में कार्य कर रही हो। यह पत्रिका भी हास्य और व्यंग्य का मिला जुला स्वरूप थी। मध्य प्रदेश उन दिनों देश के दो शीर्ष व्यंग्यकारों के लिए एक घर था, जैसे श्री हरि शंकर परसाई, जबलपुर में और भोपाल में श्री शरद जोशी। वे मेरे जैसे अन्य कई युवा लेखकों के प्रेरणा स्तम्भ थे।

हम तीन मित्रों ने व्यंग्य पर एक पत्रिका प्रारम्भ कर इस अंतर को भरने का विचार और फैसला किया। हम तीनों उस समय लिपिकीय ग्रेड में थे।  बिना किसी वित्तीय सहायता और कैनवसिंग या मार्केटिंग के अनुभव के केवल दृढ़ निश्चय और जुनून के बल पर अपनी योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया। यह वह समय था जब हमारा देश 1976 में ‘आपातकाल’ नामक इतिहास के एक काले दौर से गुजर रहा था। मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप थी; ‘अभिव्यक्ति का अधिकार’ दमनकारी था, विपक्षी नेता या तो जेल में थे या भूमिगत थे और सत्ता में मौजूद लोग रेंग रहे थे। व्यंग्य और हास्य पहली बार आपातकाल में हताहत हुआ था। ‘Shankar’s Weekly’ जैसी हास्य व विनोदी अंग्रेजी पत्रिका को बंद करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि इसने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। ऐसे आपातकाल के घने बादलों के साये में हमारी पत्रिका की परिकल्पना की गई थी और हमने जनवरी 1977 में ‘व्यंग्यम’ नाम से 500 प्रतियों प्रकाशित की जिनका मूल्य दो रुपये रखा।

 प्रकाशन की अपनी पूरी अवधि में हम तीनों मित्रों ने संपादक, प्रूफ रीडर, लेआउट डिजाइनर, ऑफिस बॉय, चाय वाले, डिस्पैचर और फेरीवाले, सभी रोल अदा किए। वर्ष 77-78 के दौरान, त्रैमासिक पत्रिका के आठ अंकों का नियमित रूप से प्रकाशन किया गया था। पत्रिका को लेखकों के मुफ्त योगदान के माध्यम से सभी प्रसिद्ध और नवोदित लेखकों से पूर्ण समर्थन मिला किन्तु निरंतर वित्तीय सहायता के अभाव में 10वें अंक के प्रकाशित होते तक  पत्रिका ने थकान और बीमारी का संकेत देना शुरू कर दिया।  इसकी कम लागत के बावजूद, दुर्भाग्य से पत्रिका अपेक्षित बिक्री या सदस्यता प्राप्त नहीं कर सकी ।”

महेश शुक्ला जी बताते हैं कि “यह उन सबके लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा कि प्रिंटिंग प्रैस के मालिक श्री नटवर जोशी जी जिनकी प्रेस हनुमानताल में हुआ करती थी, ने हमें भरपूर सहयोग दिया। जब हमारे पास प्रकाशनार्थ पैसे नहीं होते थे तो भी वे हम पर विश्वास कर पत्रिकाएँ विक्रय के लिए सौंप देते थे और कहते थे – “जब भी बिक्री से पैसे आ जाएँ तो दे देना।”

श्री आयंगर जी बताते हैं कि “धन जुटाने के उद्देश्य से हमने दो पुस्तकें और श्री राम ठाकुर दादा का एक उपन्यास ’24 घंटे ‘ शीर्षक से  भी प्रकाशित किया, लेकिन सारे प्रयास व्यर्थ हो गए ।”

वे आगे बताते हैं कि – “जल्द ही हम 1979 में पत्रिका को बंद करने के लिए मजबूर हो गए। “व्यंग्यम” को फिर से पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। पत्रिका के बंद होने से हमारे कई मित्र लेखकों और शुभचिंतकों ने भी अपने असली रंग दिखाये और चुपचाप किनारा कर लिया।”

ये उस भाग्यशाली व्यंग्यकर पीढ़ी के सदस्य हैं, जिन्हें स्व हरीशंकर परसाईं जैसी विशिष्ट विभूति का सानिध्य एवं मार्गदर्शन मिला। इन्होने उस समय अपनी पत्रिका में श्री आयंगार जी द्वारा लिया गया परसाईं जी का साक्षात्कार भी प्रकाशित किया था । बाद में श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने परसाईं जी का सबसे लंबा एवं अतिम साक्षात्कार लिया था जो काफी चर्चित रहा और अब भी बतौर ऐतिहासिक सन्दर्भ स्मरण किया जाता है ।

श्री महेश शुक्ला जी बताते हैं कि – उस दौरान नवभारत टाइम्स ने पत्रिका कि समीक्षा प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक “आपातकाल में मुरझाया व्यंग्यम” था।

मुझे इन दोनों विभूतियों से मिलाने का अब तक सौभाग्य तो नहीं मिला किन्तु फोन पर बातचीत करते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि मैं इनसे अनजान हूँ । दोनों ने बड़ी संजीदगी से मुझसे संवाद किया और प्रेरित किया। दोनों बेहद जिंदादिल इंसान हैं । मुझे इन दोनों में एक अंतरंग समानता दिखाई दी जो साझा करना चाहता हूँ । दोनों को ही संगीत से प्रेम है। अग्रज श्री श्रीराम जी बेहद सुरीले स्वर में गाते हैं और श्री महेश शुक्ल जी संगीत की धुन पर थिरकने से स्वयं को रोक नहीं पाते। 

व्यंग्यम” के दुखद अध्याय पर आज भी चर्चा करते हुए इनके नेत्र नम हो जाते हैं।

हम अपने पाठकों के लिए तीनों वरिष्ठतम व्यंग्यकारों के सस्वर व्यंग्यपाठ आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।  आशा है आपका स्नेह मिलेगा।

आप सम्मानित व्यंग्यकारों के चित्र अथवा नाम (अंग्रेजी  वर्णमाला के क्रम में) पर क्लिक कर उनकी रचना आत्मसात कर सकते हैं ।
☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ व्यंग्य रचना : किचन में मेरे कदम ☆ व्यंग्यकार एवं स्वर : श्री महेश शुक्ला ☆

श्री महेश शुक्ला 

जन्म – 15 नवंबर 1946 रायपुर
प्रकाशन –  250 व्यंग्य प्रमुख पत्रों में प्रकाशित
सम्प्रति – बैंक से सेवानिवृत्त के बाद बिलासपुर में निवास

 

☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ व्यंग्य रचना : सुदामा कृष्ण और महंगाई ☆ व्यंग्यकार : स्व. रमेश शर्मा ‘निशिकर’☆ स्वर : श्री श्रीराम आयंगर☆

स्व रमेश शर्मा ‘निशिकर’ 

जन्म – 13 सितंबर 1942 जबलपुर (म प्र )
भूतपूर्व कर्मी मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल जबलपुर, मध्यप्रदेश
प्रकाशन – साप्ताहिक हिंदुस्तान / कंचन प्रभा / माधुरी / मायापुरी / राष्ट्रधर्म / हास्यम आदि प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में .

 

☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ व्यंग्य रचना : जागरूक पीढ़ी ☆  व्यंग्यकार एवं स्वर : श्री श्रीराम आयंगर ☆

 

श्री श्रीराम आयंगर 

जन्म –  27 अप्रैल 1950 दुर्ग म प्र
प्रकाशन – सारिका, हास्यम, रंग, नवभारत टाइम्स। कहानीकार, कंचनप्रभा, मुक्ता, मायापुरी, यूथ टाइम्स, सन, अरुण, नवभारत एवं अनेक लघु पत्रिकाएं । आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित। समांतर लघु कथाएं  / काफिला / पाँच व्यंग्यकार / श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ संकलनों  में रचना प्रकाशित। व्यंगयम पत्रिका का जबलपुर से संयुक्त संपादन ( वर्तमान में स्थगित)।  पुस्तक एक बीमार सौ अनार १९८५। व्यंगयम शीर्षक से ब्लॉग 2011 से ।

लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड 2009 में उन सभी स्थानों पर विजिट करने के लिए जहां 50 वर्ष पूर्व रहे थे

एन जी ओ श्री मिशन के लिए ई पत्रिका मास्टर का सम्पादन

☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ चलते चलते – श्री महेश शुक्ला जी  एवं श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का एक महत्वपूर्ण संवाद ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

आदरणीय श्री महेश शुक्ल जी के विगत जबलपुर यात्रा के समय श्री महेश शुक्ल जी को व्यंग्यम गोष्ठी में सम्मानित किया गया एवं श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने उनसे संक्षिप्त संवाद को अपने मोबाईल में कैद कर लिया जिसे हम आपसे साझा कर रहे हैं  –

कृपया इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें  >>>>>  चलते चलते – श्री महेश शुक्ला जी  एवं श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का एक महत्वपूर्ण संवाद

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“व्यंग्यम” पत्रिका की स्मृति में विगत 34 माह से जबलपुर में  मासिक व्यंग्यम गोष्ठी का आयोजन होता रहा है । व्यंग्यम को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से “व्यंग्यम गोष्ठी”  की श्रृंखला का आयोजन सतत जारी है और भविष्य में व्यंग्यम पत्रिका की योजना भी विचाराधीन है।

विगत 34 माह पूर्व जबलपुर में मासिक व्यंग्यम गोष्ठी की श्रंखला चल रही है जिसमें व्यंग्यकार हर माह अपनी ताजी रचनाओं का पाठ करते हैं।  34 महीने पहले इस आयोजन  को प्रारम्भ करने का श्रेय जबलपुर के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डाॅ कुंदन सिंह परिहार, श्री रमेश सैनी, श्री जय प्रकाश पाण्डेय, श्री द्वारका गुप्त आदि व्यंग्यकारों को जाता है। इस गोष्ठी की विशेषता यह है अपने नए व्यंग्य का पाठ इस गोष्टी में करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तीसरे माह किसी प्रतिष्ठित अथवा मित्र व्यंग्यकारों के व्यंग्य संग्रह की समीक्षा भी की जाती है।

कोरोना समय और लाॅक डाऊन के नियमों के तहत सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए और घर की देहरी के अंदर रहते हुए अप्रैल माह की व्यंग्यम गोष्ठी इंटरनेट पर  सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना एवं संचार तकनीक का प्रयोग करते हुए आयोजित करने का यह एक छोटा सा प्रयास किया गया था ।इस गोष्ठी के लिए सूचना तकनीक के कई प्रयोगों के बारे में विचार किया गया जैसे कि व्हाट्सएप्प और वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग। किन्तु, प्रत्येक की अपनी सीमायें हैं साथ ही हमारे वरिष्ठतम एवं कई  साहित्यकार इन तकनीक के प्रयोग सहजतापूर्वक नहीं कर पाते।  इस सन्दर्भ में ई- अभिव्यक्ति ने एक अभिनव प्रयोग किया था । इस प्रयास को आप निम्न लिंक पर देख सुन सकते हैं –

☆ ई- अभिव्यक्ति का अभिनव प्रयोग – प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था “व्यंग्यम” की प्रथम ऑनलाइन गोष्ठी ☆

इस ऐतिहासिक प्रयोग के पश्चात मई 2020 माह की “व्यंग्यम गोष्ठी” को  गूगल मीट तकनीक से  कल 30  मई 2020 को आयोजित की गई। सभी प्रतिभागी व्यंग्यकारों को उनके उत्साह के लिए अभिनंदन ।

ई–अभिव्यक्ति की ओर से तीनों मित्रों को व्यंग्य विधा में उनके अभूतपूर्व ऐतिहासिक कार्यों के लिए साधुवाद।

वर्तमान में हमारे बीच उपस्थित श्री महेश शुक्ला जी एवं श्री श्रीराम आयंगर जी का हम पुनः हार्दिक अभिनंदन करते हैं । 

हमें पूर्ण आशा एवं विश्वास है कि  इस शोधपरक आलेख को आप सबका स्नेह एवं प्रतिसाद मिलेगा। आदरणीय अग्रज श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का आभार एवं आप सब का पुनः हृदय से आभार।  नमस्कार ।

अपने घरों में रहें, स्वस्थ रहें। आज का दिन शुभ हो।   

– हेमन्त बावनकर,  सम्पादक ई-अभिव्यक्ति, पुणे
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Shyam Khaparde

सकारात्मक सोच और प्रयास है, शुभकामनाएं

Shri Ram Ayyangar

Aap ko bahut sadhuvad. Vedio ke madhyam se rachna path karvana ek naya prayog hai jiske liye aap badhai ke patra hain.

Chhaya saxena

लाभदायक पोस्ट हेतु सादर प्रणाम