श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जिन्दगी जो निज़ाम की बद्नज़र से बार-बार बच जाती है…” ।)
☆ शेष कुशल # 53 ☆
☆ व्यंग्य – “जिन्दगी जो निज़ाम की बद्नज़र से बार-बार बच जाती है…” – शांतिलाल जैन ☆
कांग्रेचुलेशंस शांतिबाबू. बधाई, मुबारक हो कि आप पुरी गए थे, लौट आए, भीड़ में कुचलकर मरे नहीं. पाँच सौ से ज्यादा घायल हुए, उसमें भी बच गए! क्या बेहतरीन किस्मत लिखाकर लाए हो गुरु! प्रयागराज भी गए थे आप. न तो नईदिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुचले गए न मेले में. बड़ी बात है. निज़ाम ने इंतजामात् में इतनी कमियाँ रखीं, लापरवाही से काम लिया, इन्फ्रा खड़ा करने में कट लिया, पुलिस वीआईपी मूवमेंट में मुब्तिला रही, जिम्मेदारियाँ इस-उस पर डालीं, फिर भी मौत ने आपको छुआ तक नहीं. मौत को आप बैंगलोर में चकमा दे आए. आरसीबी की जीत का जश्न देखने गए, भगदड़ मची भी मगर आप बचकर आ गए. ठाणे से मुम्ब्रा जानेवाली लोकल ट्रेन में लटक कर जानेवालों में आप भी तो थे, चार-छह गिरकर मरे. आप बच गए. रोज़ लटक कर जाते हो, रोज जिंदा वापस आ जाते हो. कितनी बधाईयां दें आपको, हर दिन घर से निकलते हो, हर पल मौत का सामना करते हो, हर बार बचकर निकल आते हो.
कोई तो अदृश्य शक्ति है जो प्रशासन की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर भी बार बार आपको मौत मुँह से निकाल लाती है. उस रोज़ सरकारी डिस्पेंसरी वालों ने आपको नकली दवाएँ खिला दीं तब भी बच गए आप. आपके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता है मगर प्रतिरोध का साहस नहीं है. उज्जैन-इंदौर के बीच पचास किलोमीटर की दूरी में बत्तीस घंटे जाम में फंसे रहे, आपके हमराही उसी जाम में वहीं मर गए, आप बच गए. और तब तो चमत्कार ही हो गया जब स्ट्रीट लाईट बंद थी, सड़क के बीचोंबीच गढ्ढे में आपकी एक्टिवा गिरी, आपको सिर में गहरी चोट लगी और आपका सीटी स्कैन नार्मल निकला. सोचो सीईओ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को अपने विभाग की विफलता पर कितना दुःख हुआ होगा. उसकी मेहर से खड़ा होर्डिंग गिरा आप पर और आप बाल-बाल बच गए. आपके बच जाने से अस्पताल प्रशासन भी कम दुखी नहीं है, आप एडमिट थे कि आग लग गई. अबोध नवजात शिशु तक मर गए मगर किस्मत आपको फिर बचा ले गई वरना प्रशासन ने अपनी तरफ से कोई कसर बाकी रखी नहीं थी. आपके पार कर लेने के कुछ ही पलों बाद पुल भरभरा कर गिर पड़ा, फिर बच गए आप. पुरखों से विरासत में मिले जल-जंगल से झोपड़ी सहित बेदख़ल कर दिए गए आप तब भी मर जाने की नहीं सोची आपने. शहर में आकर झुग्गी तान ली. बुलडोज़र आपकी उस झुग्गी को भी जमींदोज़ करके चला गया. मलबे पर बैठी आपकी जिजीविषा ने आपको तब भी जिलाए रखा.
आर्यावर्त में जिंदा रहने के जोग कुंडली में सुपर टॉप क्लास लोग लिखाकर लाते हैं शांतिबाबू. आप जैसा मामूली से भी कमतर आदमी जितना जिंदा रह जाए उतना एक संयोग है. संयोग है कि कभी फेक एनकाउंटर के शिकार बने नहीं आप, गंदगी साफ़ करने के दौरान चैंबर की गैस में दम घुटा नहीं आपका, रेट-माईनर्स की तरह खदान में घुटकर भी नहीं मरे. सिस्टम की तमाम कोशिशों के बावजूद आप मणिपुर में भी जीवित रह जाते हो, उरी-पुंछ-राजौरी में भी, बिहार की बाढ़ में भी, वायनाड के जल प्रलय में भी, तेलंगाना के कारखानों की आग में, हरदा की पटाखा फेक्ट्री के विस्फोट में भी. जिंदा हैं तो शांतिबाबू हैं, मर जाते तो पानी के एक बुलबुले सी खबर बन कर रह जाते, एक बेमतलब का नाकाबिल-ए-ज़िक्र आँकड़ा. खुश रहिए कि रेंगती-घिसटती ही सही लाईफ चल तो रही है.
निज़ाम की बद्नज़र से कब तक बचोगे शांतिबाबू. बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी! रेल भी यहीं है, गिरने वाले पुल भी, गढ्ढ़ों वाली सड़क भी, निज़ाम भी यही है, उसका बुलडोज़र भी यहीं है. एक दिन सिस्टम आपकी बलि तो लेकर रहेगा. देखते जाईए आप भी यहीं हैं और हम भी.
जननायक को ट्विटर पर शोक सन्देश लिख देने के सुख से लम्बे समय तक वंचित नहीं रख सकेंगे आप. तब तक के लिए कांग्रेचुलेशंस शांतिबाबू.
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© शांतिलाल जैन
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