श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी…” ।)
☆ शेष कुशल # ५५ ☆
☆ व्यंग्य – “गरीब का जीना भी कोई जीना है लल्लू!!…” – शांतिलाल जैन ☆
इन दिनों यमराज और उनका पूरा डिपार्टमेंट हैरान परेशान है. चित्रगुप्त का और चुनाव आयोग के डाटा का आपस में मिलान नहीं हो पा रहा. यमदूत जिसकी आत्मा लेने इहलोक में आते हैं मतदाता सूची में वे ऑलरेडी मरे हुए निकलते हैं. बीस बाईस लाख आत्माएँ तो अकेले बिहार में हैं जो मरने के बाद भी सशरीर आर्यावर्त में ही घूम रहीं हैं. चुनाव आयोग उनको जिन्दा नहीं मान रहा और यमदूत उनको ले जा नहीं पा रहे. ‘सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और अनारकली हम तुम्हें जीने नहीं देंगे’ टाईप का मामला है. वैसे हमारा चुनाव आयोग निष्पक्ष और निडर है. उसने चित्रगुप्त को एफेडेविट देकर साफ़ साफ़ बोल दिया है कि जो मरे नहीं उनके नाम एक सितम्बर तक बता दें हम वेरीफाई करा लेंगे, शेष आत्माएँ आप ले जाईए परलोक में. बैकुंठ में रखिए, स्वर्ग में रखिए, नर्क में रखिए, बफर ज़ोन में रखिए – कहीं भी रखिए, ये आपका सरदर्द है. आर्यावर्त में नहीं रहेंगे. आप ले जा पाए तो ठीक, नहीं तो सशरीर पृथ्वीलोक में ही उनको कहीं डिपोर्ट कर दिया जावेगा.
चित्रगुप्त की परेशानी यहीं तक सीमित नहीं है. हजारों मामलों में यमदूत रोजाना बिना आत्मा लिए खाली हाथ वापस आ जा रहे हैं. अब आप इन पंक्तियों के लेखक का ही मामला लीजिए. पिछले दिनों यमदूत उनको लेने आया था और कंफ्यूज होकर वापस चला गया, खाली हाथ. जाकर चित्रगुप्त को रिपोर्ट किया – “प्रभु, सेम पर्सन, सेम वोटर आईडी. फोटो में भी सेम-टू-सेम सांतिभिया उज्जैन में भी मिले, लखनऊ में भी, बेंगलुरु में भी, फिर महाराष्ट्र में भी. मैं कौनसे वाले सांतिभिया को लाता, टेल-मी.”
“पिताजी के नाम से मिलान करके ले आना था.”
“प्रभु, फादर का नाम ऐसा उजबक् कि कांट प्रोनाउंस. क्या तो लिखा था एएसडीऍफ़जी….समथिंग लाईक देट.”
“यमदूत होकर इत्ती अंग्रेजी बोलते हो!!”
“सॉरी सर, पिछले दिनों ही आर्यावर्त में ट्रान्सफर होकर आया हूँ. पहले लंदन से आत्माएँ लाता था.”
उधर सांतिभिया भी खुश. न कभी डाटा टेली होगा न कभी वे मरेंगे, और चार जगह वोट डालने को मिलेगा सो बोनस में. डेमोक्रेसी मज़बूत करने के लिए एक से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों में वोट डालकर वे अपना अप्रतिम योगदान देते रहेंगे. आर्यावर्त के लोकतंत्र में जिन्दा रहना भी एक कला है. काश, सावित्री को यह कला आती. उसने चुनाव आयोग से संपर्क किया होता तो सत्यवान को वापस लाने के लिए यमराज की चिरौरी नहीं करनी पड़ती.
बहरहाल, ऐसा सभी मामलों में नहीं हुआ है. बहुत से लोग सच में जिन्दा मिले हैं मगर उनकी कद-काठी चित्रगुप्त के रिकार्ड से मैच नहीं कर रही. उनको आदमकद होना था मगर वे कद में इतने छोटे-छोटे थे कि एक कमरे के मकान में एक सौ अस्सी की संख्या में समाए हुए थे. बरसों से बंद एक कमरे में सैकड़ों की संख्या में घूमते तिलचट्टों नुमा. यमदूत फिर कन्फ्यूज्ड. खचाखच भरे एक कमरे के मकान में पाँव रख पाना मुश्किल तो आत्मा निकालकर बाहर लाएँ कैसे ?
वैसे आप और हम इस बात पर और अधिक गर्व कर सकते हैं भारत ने दुनिया को शून्य की अवधारणा दी और आयोग ने उसका उपयोग हजारों मकानों को पहचान देने में किया है. महान भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के बाद ये चुनाव आयोग ही है जिसने शून्य का इतना शानदार उपयोग किया है. ये बात और है कि इससे यमदूत चकरघिन्नी हो गए हैं कौनसे वाले ज़ीरो नंबर के मकान से आत्मा ले जाना है, समझ नहीं आता.
यमदूतों का जॉब इतना कठिन कभी नहीं रहा श्रीमान् जितना इन दिनों हो गया है. एक मकान में वे एक सौ चौबीस वर्षीय महिला को लेने के लिए पहुँचे. महिला की आत्मा ने साथ में चलने से मना कर दिया, कहा – ‘फर्स्ट-टाईम वोटर हूँ मैं, मैंने अभी-अभी तो फॉर्म सिक्स भरकर वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाया है. अभी से मैं आपके साथ कैसे चल सकती हूँ. दो-चार बार वोट डालने तो दीजिए. दो हज़ार सैंतालीस का विकसित भारत देख लूं, फिर चलूंगी,’ बेचारा यमदूत, मुँह लटकाकर वापस चला गया.
आंकड़ों के मिलान, चेकिंग, बेलेंसिंग, रिकन्सिलीएशन ने इन दिनों आर्यावर्त में जन्म-मृत्यु का सिस्टम बिगाड़ दिया है. चुनाव आयोग एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था है, उसकी विश्वसनीयता संदेह से परे है. रिकार्ड तो चित्रगुप्त को ही अपना ठीक करना पड़ेगा. गरीब, अनपढ़, प्रवासी, अल्पसंख्यकों को मृत दिखाकर बीएलओ ने अपनी ड्यूटी निभा दी है अब उन आत्माओं को आर्यावर्त से ले जाना यमराज के डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी है. वैसे आर्यावर्त में गरीब का जीना भी कोई जीना है लल्लू!!
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© शांतिलाल जैन
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






