डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

कोरिया में रहते हम भारतीयों को एक भारत प्रेमी कोरियाई मित्र मिलें….ली यंग ची! जो भी नया भारतीय प्रोफेसर विश्वविद्यालय में आता वह उनसे मिलने अवश्य आ जाते। वैसे ही वे मुझे भी मिलने आए। फिर ड़ॉ. रवीन्द्र गर्गेश, ड़ॉ. राजीव खन्ना, डॉ. रमेश शर्मा और फिर डॉ. एम. पी शर्मा इन सबसे वे मिले। फिर हम सबका एक अच्छा ग्रूप ही बना। कोरियाई संस्कृति की बहुत सी जानकारी उनसे ही हमें मिली थी। वे हमें वीक येंड पर कभी कोरिया क कुछ खास जगहों पर घूमाने ले जाते फिर वह स्प्रींग फेस्टीवल हो या,पहाडी पर बना कोई बौद्ध विहार हो, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमारेखा हो या फिर घर का कोरियन भोजन हो वे हमें ले जातें, साथ आतें और कभी कभी मेरे घर आकर भारतीय भोजन भी करते। कोरिया की परिवार- व्यवस्था, वहाँ के पारिवारिक संबंध, मान-सम्मान आदि की जानकारी उनसे तथा अन्य दोस्तों से मिली। श्रीमान यंग ची ली से आज भी मैं सोशल मीडिया के ज़रिए जुडी हुई हूँ। मैं जब कोरियाई लोकोक्तियों पर यूँ ही काम कर रही थीं तो उन्होंने मुझे कई लोकोक्तियों की जानकारी दी थीं। कोरियाई संस्कृति को समझने के लिए कुछ अंग्रेजी पुस्तकें भी ला दी थीं। उनकी वजह से कोरियाई भाषा और संस्कृति को समझने में भी आसानी हो रही थी।

कोरिया मेरे लिए केवल एक विदेश में जाकर अपनी सेवाएं देना नहीं था। वह एक प्रवास भी था.. एक सांस्कृतिक प्रवास!… जिसमें मैंने आधुनिकता और परंपरा को एक साथ चलते हुए देखा। जब मैं सियोल पहुँची थी, तब मेरी आँखों के सामने एक अत्यंत आधुनिक, विकसित देश था..ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, अत्याधुनिक मेट्रो, हर हाथ में मोबाइल और भागती हुई ज़िंदगी। मुझे लगा था कि इतने आधुनिक समाज में शायद पारिवारिक जीवन केवल औपचारिकता भर रह गया होगा.. किंतु धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि इस चमकदार आधुनिकता के भीतर एक अत्यंत गहरी पारिवारिक चेतना जीवित है।

कोरिया को समझने के लिए वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था को समझना आवश्यक है। वहाँ परिवार केवल माता-पिता और बच्चों का छोटा-सा समूह नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा, पूर्वजों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ी एक जीवित संस्था है। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था पर कन्फ्यूशियस विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है। चीन से आए कन्फ्यूशियस दर्शन ने सदियों तक कोरिया के सामाजिक और नैतिक जीवन को दिशा दी। विशेषकर जोसॉन राजवंश के समय परिवार को समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया। कन्फ्यूशियस सिद्धांतों के अनुसार माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रकि आज्ञाकारिता, परिवार की प्रतिष्ठा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य माने जाते थे। यही कारण है कि कोरिया में बच्चों को बचपन से ही विनम्रता, अनुशासन और पारिवारिक मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता रहा।

पुराने समय में कोरिया में तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं। परिवार का मुखिया सबसे वरिष्ठ पुरुष होता था और उसका निर्णय पूरे परिवार के लिए अंतिम माना जाता था। बहुएँ सास-ससुर की सेवा को अपना धर्म समझती थीं और पुत्र अपने माता-पिता की अनुमति के बिना कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते थे। यह सब सुनते-पढ़ते मुझे अपने भारतीय संयुक्त परिवारों की याद आती रहती थी। मुझे अक्सर लगता कि एशिया की संस्कृतियों में भले ही भाषाएँ भिन्न भिन्न हों, पर परिवार के प्रति भाव लगभग समान हैं।

मुझे आज भी वह दिन याद है जब मुझे और डॉ. गर्गेश जी को हमारे एक कोरियाई छात्र आलाम (कोरियन व्यक्तिवाचक नाम) ने अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके घर में उनके बुज़ुर्ग पिता भी थे। सबसे मिलने और बातें करने के बाद मेज़ पर भोजन लगाया गया… और कहा गया कि भोजन के लिए चलें…भारतीय सहजता में हम जाकर खाने की मेज़ के पास बैठने लगें, पर बाकी सब वहीं रुके रहें मेरी समझ में नहीं ?..तभी आलाम ने मुस्कुराते हुए पर हौले से कहा, “पहले अप्पा…” हम तुरंत सँभल गएं। यही बात मैंने प्रो. ली हो जंग के घर में भी महसूस की थी। कुछ ही क्षणों में उसके पिता कमरे में आए। घर के सभी सदस्यों ने हल्का झुककर उनका अभिवादन किया और उनके बैठने के बाद ही बाकी लोग बैठें। उस दृश्य में एक शांत गरिमा थी।  अचानक मुझे अपना घर याद आ गया जहाँ बचपन में दादा जी के बैठने के बाद ही भोजन आरंभ होता था। भारत और कोरिया के बीच  हज़ारों किलोमीटर की दूरी अवश्य है, पर संस्कारों की धरती कहीं बहुत निकट है। केवल घरों में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में भी बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता था। मेट्रो में युवा तुरंत अपनी सीट वृद्ध लोगों के लिए छोड़ देते थे। किसी बड़े व्यक्ति को वस्तु देते समय दोनों हाथों का प्रयोग करना सामान्य शिष्टाचार माना जाता था। भले ही पेन ही क्यों न देना हो दोनों हाथों से पकड़कर ही दिया जाता था। अभिवादन करते समय हल्का झुकना वहाँ के व्यवहार का सहज हिस्सा था। इन छोटी-छोटी बातों में मुझे संस्कारों की वह निरंतरता दिखाई देती थी जो आधुनिक जीवन की तीव्र गति के बीच भी जीवित थी। भोजन के दौरान हमने देखा कि घर का युवा बेटा अत्यंत संयम से बैठा था। वह अपने पिता के सामने ऊँची आवाज़ में बोल नहीं रहा था और न ही किसी प्रकार की असावधानी दिखा रहा था। मेरे छात्र ने बताया कि माता-पिता के सामने धूम्रपान या शराब पीना आज भी असभ्यता माना जाता है। मैंने हल्के मज़ाक में कहा, “तो फिर यहाँ के युवाओं को दो व्यक्तित्व रखने पड़ते होंगे, एक दोस्तों के साथ और एक घर में!” मेरी बात सुनकर वह झेंप गया।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था की सबसे अद्भुत बात मुझे यह लगी कि वहाँ दूर-दूर के रक्त-संबंधी भी स्वयं को एक ही परिवार का सदस्य मानते हैं। यदि किसी व्यक्ति का पूर्वज समान है, तो वे स्वयं को “इल्गा” अर्थात् “एक ही घराने/ परिवार/वंश” का सदस्य कहते हैं। कोरिया में बसी एक अमेरिकन प्रोफेसर मिस. एलिना जो वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और सालों से वहीं कोरिया में थी, उसने एक दिन अपने कोरियाई मित्र को घर बुलाया था, उस समय उसने मुझे और मोशा को भी आमंत्रित किया थ…स्ट्रॉबेरी और योगहर्ट खाने के लिए। तब बातों ही बातों में उस कोरियाई महिला ने हमें अपने परिवार की वंशावली हमें दिखायी थी.. बिलकुल वंशवृक्ष बनाकर। वह बता रही थी ऐसे वंशवृक्ष में कई पीढ़ियों के नाम, जन्म, विवाह, मृत्यु, सरकारी पद और यहाँ तक कि कब्रों के स्थान तक दर्ज होते हैं। मैं आश्चर्य से उसे देखती रही। मुझे लगा जैसे मैं किसी परिवार का इतिहास नहीं, बल्कि किसी छोटे राज्य का अभिलेख ही देख रही हूँ। मोशा और मैं दंग रह गए इतनी बारीकी से विवरण दिया जाता है। वैसे अपने यहाँ भी कुछ कुछ समुदायों में ऐसी जानकारी मिलती हैं। मुझे याद है हमारे गली में कुछ खास समुदाय ( विशेषकर लिंगायत समुदाय के कोष्टि (जाडरु) समुदाय) के लोग आते थे और घर-परिवार की जानकारी अपने बही खाते में दर्ज कर जाते थे… कौन-कौन अब नहीं रहें, कौन नया सदस्य परिवार में जन्मा है इसकी जानकारी वे लेते हैं। ये सरकारी लोग नहीं होते.. ये उस खास कम्युनीटि के स्वामी जैसे लगते थे.. जिन्हें ‘हेळव’ कहा जाता था.. अर्थात सुमदाय के बारे में जानकारी देनावेला या रखनेवाला.. जो हर साल आकर घर घर जाकर जानकारी इकट्ठा कर अपने बही खाते में दर्ज कर देते थे।

दरअसल कोरिया में वंशावली केवल दस्तावेज़ नहीं बल्कि वह सम्मान, पहचान और पारिवारिक स्मृति का प्रतीक होती है। परिवार के लोग उसे लगभग किसी पवित्र ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखते हैं। कोरिया में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुई। उसने बताया कि विशेष अवसरों पर वे अपने पूर्वजों की स्मृति में भोजन अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करते हैं। विशेष रूप से “चुसोक” जैसे पारिवारिक त्योहारों के समय पूरा कोरिया जैसे अपने मूल की ओर लौटता दिखाई देता है। लोग महानगरों से अपने गाँव जाते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर श्रद्धा अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ पारंपरिक भोजन करते हैं। उस समय मुझे बार-बार भारतीय पर्वों की याद आती थी,  ऐसे पर्वों और उत्सवों के समय घर से दूर रहने वाले लोग अपने घर लौटने का प्रयास करते हैं। मुझे लगा कि एशिया की संस्कृतियों में भी परिवार केवल साथ रहने भर की व्यवस्था नहीं है, बल्कि स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। उस आधुनिक महानगर में यह दृश्य देखकर मुझे लगा कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य अपनी जड़ों से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को समझने में वहाँ के पारिवारिक संबोधनों ने मेरी बहुत सहायता की। वहाँ हर रिश्ते के लिए अलग शब्द है और यह भी महत्वपूर्ण है कि बोलने वाला लड़का है या लड़की। लड़की अपने बड़े भाई को “ओप्पा” कहती है, जबकि लड़का अपने बड़े भाई को “ह्योंग” कहता है। बड़ी बहन के लिए “ओन्नी” और “नूना” जैसे अलग संबोधन हैं। शुरू-शुरू में मैं इन शब्दों में बहुत उलझ जाती थी। एक बार मैंने गलती से किसी महिला को “ह्योंग” कह दिया। साथ में बैठे छात्र हँसने लगे और मैं संकोच से भर उठी। बाद में वही घटना हमारी मित्र-मंडली का प्रिय हास्य प्रसंग बन गई। पर धीरे-धीरे समझ आने लगा कि ये संबोधन केवल शब्द नहीं हैं, इनके भीतर पूरा सामाजिक अनुशासन और आत्मीयता छिपी हुई है। एक और बात वहाँ संबंधों के भीतर एक विशेष भावनात्मक आत्मीयता है, जिसे कोरिया में “जोंग” (Jeong) कहा जाता है। यह ऐसा लगाव है जो केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मित्रों, पड़ोसियों और सहकर्मियों तक फैल जाता है। शायद यही कारण था कि मि.ली यंग ची, या मि. जून जैसे लोग हमारे लिए केवल परिचित नहीं रहे, बल्कि परिवार जैसे बन गए थे। मुझे कई बार लगा कि कोरियाई समाज की आत्मा इसी “जोंग” में बसती है।

ओप्पा, अम्मा जैसे संबोधनों को सुनते हुए मैं बार-बार मराठी और कन्नड भाषा से रिलेट कर करती थी। दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक की पारिवारिक संस्कृति में भी रिश्तों के लिए अत्यंत आत्मीय और सूक्ष्म संबोधन हैं, अण्णा, अक्का, अम्मा, अप्पा, अज्जी, अज्जा, चिकप्पा, माव आदि। ऐसे ही मराठी में भी हैं दादा, भाऊ, आई, बाबा, आजी, आजा, काका, मामा आदि आदि हिंदी में भी है। हमारी तरह ही कोरिया में भी किसी बड़े व्यक्ति को केवल नाम से पुकारना असभ्यता माना जाता है। बस अंग्रेजी ने सारे संबंधों को ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा दिया है। कोरिया में “ओप्पा” सुनते ही मेरे मन में “अण्णा” गूँज उठता था। “अम्मा” और “अप्पा” जैसे शब्द तो इतने परिचित लगे कि कई बार मुझे लगता था जैसे मैं किसी दूर देश में नहीं, बल्कि अपने ही सांस्कृतिक परिवेश के किसी दूसरे रूप में हूँ। इन्हीं समानताओं ने मेरे भीतर कोरियाई भाषा और वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। मुझे लगा कि एशियाई संस्कृतियों में परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक संसार का केंद्र है।

कोरिया में नामों की परंपरा भी अत्यंत रोचक है। वहाँ पहले पारिवारिक नाम और बाद में व्यक्तिगत नाम बोला जाता है, जैसे किम, यी, पाक, जून आदि। (वैसे वहाँ इतने अधिक ‘किम’ नाम वाले हैं कि वे ही लोग हँसी मज़ाक में कहते हैं कि पहाड़ से यदि एकाध पत्थर उछाला जाय तो निश्चित ही वह किसी ‘किम’ के सिर पर आकर गिरेगा) मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि विवाह के बाद भी महिलाएँ अपना पारिवारिक नाम नहीं बदलतीं। यह बात मुझे बहुत भायी, क्योंकि इससे स्त्री की मूल पहचान बनी रहती है। कोरिया में यह भी माना जाता था कि व्यक्ति का नाम उसके भाग्य को प्रभावित करता है। इसलिए बच्चों के नाम ऐसे रखे जाते थे जिनका अर्थ समृद्धि, दीर्घायु, सौभाग्य या सुंदरता से जुड़ा हो।

पुराने कोरिया में समाज कई वर्गों में विभाजित था। “यांगबान” उच्च वर्ग माना जाता था जिसमें कुलीन, विद्वान और अधिकारी आते थे। निम्न वर्गों पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध थे। मैंने कही पढ़ा था कि पुराने ज़माने में उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों को “सांगनोम” (नीच लोग) कहकर पुकारते थे और उनके साथ अत्यंत तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते थे। प्रत्येक वर्ग के बीच पहनावे, रहन-सहन और भाषा के मामलों में और विशेष रूप से विवाह तथा अंतिम संस्कार की रस्मों में स्पष्ट भेदभाव और प्रतिबंध लागू थे। जो लोग इन नियमों का उल्लंघन करते थे, उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। निम्न वर्ग के लोगों को खपरैल की छत वाले घर बनाने की मनाही थी, और सामान्य वर्ग के लोगों को अपने घरों के प्रवेश द्वार पर कोई फाटक लगाने या पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाने की अनुमति नहीं थी। यह पढ़ते हुए मुझे भारतीय समाज की वर्गीय और जातीय संरचना की शिद्दत से याद आई। मनुष्य ने लगभग हर समाज में ऊँच-नीच की दीवारें बनाई हैं। हालाँकि आधुनिक कोरिया इन विभाजनों से बहुत आगे निकल चुका है, फिर भी पुराने शब्द और सामाजिक स्मृतियाँ कहीं-कहीं आज भी जीवित हैं।

आज का कोरिया बदल रहा है। हालाँकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने कोरिया में भी कई सामाजिक परिवर्तन ला दिए हैं। छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवाओं में अकेले रहने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है और विवाह तथा जन्म-दर को लेकर वहाँ गंभीर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं। फिर भी मैंने अनुभव किया कि इन परिवर्तनों के बीच परिवार आज भी लोगों के भावनात्मक जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। आधुनिकता के बीच भी वे अपनी जड़ों को पूरी तरह छोड़ नहीं पाए हैं। महानगरों में छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवा पीढ़ी अधिक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है और जीवन की गति पहले से कहीं अधिक तेज़ हो गई है। फिर भी मैंने महसूस किया कि परिवार आज भी वहाँ भावनात्मक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। त्योहारों पर लोग अपने गाँव लौटते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर जाते हैं और पूरे परिवार के साथ समय बिताते हैं।

मि. ली यंग ची ने एक दिन कहा था कि “हम कोरियन आधुनिक हो सकते हैं, लेकिन परिवार को नहीं छोड़ सकते।” उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई थी। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को देखकर यही लगा कि संस्कृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं रहती, वह लोगों के व्यवहार, संबोधनों, भोजन की मेज़, पूर्वजों की स्मृतियों और बुज़ुर्गों के प्रति आदर में जीवित रहती है। सियोल की चमचमाती सड़कों और आधुनिक जीवन के बीच मैंने जो सबसे सुंदर चीज़ देखी, वह थी परिवार के प्रति उनका गहरा सम्मान, शायद इसलिए भी कि मैं भी संयुक्त परिवार में ही पली बढ़ी हूँ। बात तो आखिर यही है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। सच्ची आधुनिकता शायद वही है जहाँ मनुष्य आगे बढ़ते हुए भी अपने पूर्वजों, अपने परिवार और अपनी स्मृतियों का हाथ थामे रहता है।

कोरिया से लौटते समय मेरे साथ केवल कुछ तस्वीरें या वहाँ के मेरे वास की स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि संबंधों को देखने की एक नई दृष्टि भी थी। सियोल की चमकती रोशनियों के पीछे मैंने एक ऐसा समाज देखा जो आज भी अपने पूर्वजों की स्मृतियों, पारिवारिक संबोधनों और बुज़ुर्गों के सम्मान में अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है। मुझे बार-बार लगा कि एशिया की संस्कृतियाँ भले ही अलग भाषाओं में बोलती हों, पर उनके हृदय की धड़कन कहीं समान है..परिवार, स्मृति और आत्मीयता से परिपूर्ण!

*********

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted