(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेखसमकालीन व्यंग्य में प्रतिबद्धता

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 217 ☆  

? आलेख – समकालीन व्यंग्य में प्रतिबद्धता?

प्रतिबद्धता को साहित्यिक आलोचना के संदर्भ में  इस तरह समझा जाता है कि रचना के केंद्र में सर्वहारा वर्ग की उपस्थिति है या नहीं ?  अर्थात  व्यंग्यकार से यह अपेक्षा कि वह दलित, पीड़ित,  दबे, कुचले व्यक्ति या समाज के भले के लिये ही लिखे. जब ऐसा लेखन होगा तो वह सामान्यतः शासन के, सरकारों के, अफसरों और नेताओ के, पूंजीपतियों और सेठों के विरोध में ही होगा. पर मेरी नजरों में ऐसा नहीं है कि व्यंग्य का काम केवल यही है. प्रति प्रश्न है कि क्या जालसाजी करके झूठे कागजों से यदि कोई गरीब बार बार सरकारी योजनाओ का गलत लाभ उठाता है तो क्या उस पर व्यंग्यकार को कटाक्ष कर उसे चेतावनी नहीं देनी चाहिये ?

पीड़ित दिखने वाला सदैव पीड़ित ही नहीं होता यह प्रमाणित होता है जब राशन कार्ड के भौतिक सत्यापन से ढ़ेरों नाम गायब हो जाते हैं. दरअसल यह प्रवृति कम कमजोर द्वारा ज्यादा कमजोर के शोषण को इंगित करती है और मेरी नजर में यहां प्रतिबद्धता सत्य के पक्ष में होनी चाहिये. यदि शासन ऐसे गलत कार्य करने वालो की धर पकड़ करे तो व्यंग्यकार को सरकार के साथ होना चाहिये न कि प्रतिबद्धता का चोला ओढ़कर गलत कार्य कर रहे व्यक्ति के साथ.

प्रतिबद्धता की बाते करते हुए सदैव सर्वहारा साहित्य का आग्रह किया गया और कहा गया कि सामाजिक रूपांतरण में रचना की भूमिका ‘पक्षधर विपक्ष’ की होनी चाहिए. प्रगतिवादी, जनवादी आंदोलन से साहित्य आजादी के बाद से सतत प्रभावित रहा. किन्तु आज व्यंग्य आंखे खोलकर लिखा जा रहा है, महज किसी वाद के चलते नहीं. अतः हो सकता है कि प्रतिबद्धता की परिभाषा के चश्मे से व्यंग्य में प्रतिबद्धता का अभाव नजर आये, पर सत्य के और मानवीय नैसर्गिक मूल्यों की कसौटी पर व्यंग्यकार खरी खरी ही लिख रहा है.

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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