(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – पुरस्कार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 260 ☆

? व्यंग्य – पुरस्कार ?

वरिष्ठ व्यंग्यकार को बड़ा नगद  पुरस्कार मिला था। दिलवाने वाले प्रकाशक के साथ सेलिब्रेट कर रहे थे। एक एक पैग लेने के बाद वरिष्ठ व्यंग्यकार ने प्रकाशक से कहा प्रकाशन के लिए होड़ की दौड़ है। व्यंग्य खतरे में है। काजू खाते हुए प्रकाशक ने हामी भरी। उसने कहा प्रूफ पढ़े बिना अप्रूव कर देते हैं। सोशल मीडिया के स्व संपादित त्वरित प्रकाशन से संपादन पर विराम लग गया है।

गिलास में सोडा मिलाकर अगला पैग बनाते हुए चर्चा बढ़ी, व्यंग्य लोकप्रिय विधा है। शीर्षक और कुछ अदल बदल कर वही लेख, अलग अलग प्रकाशनों से नई नई किताबों के रूप में छप रहे हैं। पैसे वाले लेखकों के लिए पुस्तक प्रकाशन अब निवेश है। नाम, सम्मान और पुरस्कार के लिए ये इन्वेस्टमेंट धड़ल्ले से किया जा रहा है।  पुरस्कार सैटिंग है।

प्रकाशक बोला ज्यादातर व्यंग्य लेखन, साहित्य, कला और बहुत हुआ तो राजनेताओं, पोलिस के गिर्द लिखे जा रहे हैं, शायद लेखक स्वयं पर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता।

लेखक ने बात बढ़ाई, साफगोई का अभाव बड़ा संकट लगता है। धर्म पर कुछ लिख दो बिना समझे ही फतवे लेकर भीड़ खड़ी मिलती है, भावनाए बहुत जल्दी आहत हो रही हैं। इसलिए व्यंग्यकार मेन प्लेटफार्म की जगह बाई पास से निकल जाना चाहता है।

प्रकाशक हंसा …जहां उसे यश तो मिल जाए पर खतरे न हो।

फिर गंभीर होकर बोला ये तो सब ठीक है, आपकी कोई भी नई पांडुलिपि दीजिए, सरस्वती  पुरस्कार वालों से आपके लिए बात हो गई है।

वरिष्ठ लेखक की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा, अरे अब क्या नया क्या पुराना, साहित्य तो साहित्य है। तुम तो ज्ञान  पुरस्कार के लिए जो किताब छापी थी उसी मैटर को हर पैरा के लघु व्यंग्य कथा बनाकर छाप लो और पुस्तक जमा करवा दो। पर यार इस बार कवर धांसू होना चाहिए, और हां संस्कृति सचिव से भूमिका जरूर लिखवा लेना।

दोनो मुस्कराते हुए अगला पैग गटकने लगे।

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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