(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख सच्चे सम्मान का असम्मान सर्वथा अस्वीकार्य। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 276 ☆

? आलेखसच्चे सम्मान का असम्मान सर्वथा अस्वीकार्य ?

सीधे सरल अर्थ में साहित्यिक  सम्मान साहित्यकार की रचना धर्मिता के प्रति किसी संस्था के कृतज्ञता बोध का प्रतीक होना चाहिए। जिसका असम्मान सर्वथा अनुचित है। किंतु, वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में साहित्यकारों को प्रदान किए जाने वाले सम्मान कई तरह से दिए जा रहे हैं।

कहीं साहित्यकार से संस्था की सदस्यता या अन्य बहाने से राशि लेकर, तो कहीं सिफारिश के आधार पर चयन होता दिखता है। कहीं किसी स्वनाम धन्य बड़े अफसर या प्रभावी व्यक्तित्व से कोई अप्रत्यक्ष लाभ की प्रत्याशा में सम्मान किया जाता है, तो कहीं पुरुस्कार राशि वापस ले कर सौदेबाजी देखने मिल रही है। इस तरह के सम्मान स्वतः ही कालांतर में अपनी साख खो देते हैं।

राजनैतिक कारणों से लिए दिए गए सरकारी सम्मानों की वापसी के प्रकरण पढ़ने सुनने को मिलते रहे हैं, स्पष्टतः पुरस्कारों के ये असम्मान नैतिक क्षुद्रता के भौंडे प्रदर्शन हैं। 

संक्षिप्त में कहें तो साहित्यकारों के सच्चे सम्मान उनके सारस्वत कृतित्व को और जिम्मेदार बनाते हैं, और ऐसे सम्मान का असम्मान नितांत गलत है।

* * * *

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

इन दिनों, क्रिसेंट, रिक्समेनवर्थ, लंदन

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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