डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 293 ☆

☆ व्यंग्य ☆ चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना

भाइयो, आज की दुनिया में आदमी पैसा कमाने के लिए तरह-तरह के धंधे कर रहा है। कई लोग विद्यार्थियों के हितार्थ प्राइवेट कोचिंग क्लासें चलाते हैं जहां इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के नाम पर खासे पैसे बटोरे जाते हैं। यह पाप का धंधा है क्योंकि सब जानते हैं कि जैसे जीवन का हश्र मृत्यु है वैसे ही पढ़ाई का हश्र  बेरोज़गारी है। इसलिए हमने दूसरों के इहलोक और अपने परलोक का ध्यान रखते हुए ऐसी ट्रेनिंग देने का धंधा चुना है जो तुरन्त फलदायी और सौ प्रतिशत सफलता देने वाली है। अगली पहली तारीख को हमारे ‘चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान’ का उद्घाटन है। आप इष्ट-मित्रों सहित सादर आमंत्रित हैं। संस्थान के लिए भवन हमने चापलूसी के द्वारा बहुत कम किराये पर प्राप्त कर लिया है, इसलिए हमारे प्रशिक्षण की उपयोगिता पहले ही चरण में सिद्ध हो चुकी है। उद्घाटन के लिए हम एक चापलूसी-प्रेमी समर्थ व्यक्ति को बुला रहे हैं। उनकी छत्रछाया में हमारे स्नातक बरसों तक फलें-फूलेंगे।

आज के युग में चापलूसी की उपयोगिता पर प्रकाश डालने की ज़रूरत नहीं है। राजनीति से लेकर सरकारी और निजी दफ्तरों-संस्थानों तक सभी जगह उसके लिए असीम क्षेत्र फैला है। जो लोग अपने को चापलूसी से ऊपर समझते हैं वे यह सुनकर प्रसन्न हो जाते हैं कि ‘भाई जी, आपमें यही खूबी है कि आप चापलूसी पसन्द नहीं करते।’ इसलिए हम ट्रेनिंग के इच्छुक लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि हमारे संस्थान के स्नातकों को कभी काम और दाम की कमी नहीं रहेगी। गुर हम देंगे, बाकी स्नातक की मेहनत, चतुराई, और बेशर्मी पर निर्भर होगा।

आपको और विश्वास दिलाने के लिए हमारे प्रशिक्षण के प्रमुख पहलू आपके अवलोकनार्थ और विचारार्थ प्रस्तुत हैं—

सूचना संग्रह:- चापलूसी  प्रशिक्षण के प्रथम चरण में समर्थ व्यक्ति से संबंधित ज़रूरी सूचना के संग्रह की विधि बतलायी जाएगी। ‘भाई जी’ के जन्म-स्थान (जो अब तीर्थस्थल हो जाएगा), उनकी शिक्षा (अगर पढ़े लिखे हों तो), उनके जनक जननी, भाई बहन, पुत्र पुत्रियों, नाती पोतों, दादा दादी, नाना नानी, चाचा चाची, मामा मामी, रिश्तेदारों मित्रों के बारे में पूरी सूचना प्राप्त करना अनिवार्य होगा। ‘भाई जी’ के शत्रुओं का पता लगाना भी उतना ही ज़रूरी होगा ताकि गाहे-बगाहे  कहा जा सके— ‘अरे भाई जी, कहां आप और कहां वह ससुरा दो  टके का आदमी।’

इसके साथ ‘भाई जी’ की रुचियों का पता लगाना भी ज़रूरी होगा। क्या खाना, क्या पीना, कैसे कपड़े, कैसे जूते, कौन सा फूल, कौन सा इत्र, कैसी भेंट पसन्द करते हैं। अगर पान खाने के शौकीन हों तो चापलूसी की गुंजाइश ज़्यादा है। और अगर चटोरे हों तो गुंजाइश और भी ज़्यादा है क्योंकि चापलूसी में सिर्फ बातों की खुशामद ही नहीं, सब प्रकार की सेवाएं सम्मिलित होती हैं।

पुराने, सड़े-गले संस्कारों की सफाई:- हमारे प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य प्रशिक्षणार्थी के सड़े-गले संस्कारों की पूरी सफाई करना होगा। कई लड़के दंभ से कहते हैं, ‘हमारे बाप ने हमें यह नहीं सिखाया।’ अरे भई, आपके बाप ने आपको काम की बातें नहीं सिखायीं तो हम सिखायेंगे। कई लोग ‘आत्मसम्मान’ में अकड़े रहते हैं। हम उन्हें सिखाएंगे कि ‘सम्मान’ और ‘आत्मसम्मान’ में कोई भेद नहीं। जिसका समाज में सम्मान नहीं, उसका आत्मसम्मान किस काम का? आज के ज़माने में सम्मान चापलूसी से ही प्राप्त होता है। आप चापलूसी के द्वारा बड़े साहब के दिल तक पहुंच कर लें तो छोटे साहब आपको देखकर कुर्सी से खड़े होने लगेंगे।

आत्मसम्मान की पूरी सफाई के चरण में हमारे प्रशिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को रोज़ एक घंटा धाराप्रवाह गालियां देंगे और उनकी थुक्का- फजीहत करेंगे। प्रशिक्षणार्थियों को मुस्कराते हुए वह सब सुनने का अभ्यास दिलाया जाएगा।

सैद्धांतिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण:- प्रशिक्षण में हम व्याख्यानों के द्वारा प्रशिक्षणार्थियों को चापलूसी की नवीनतम तकनीकों से परिचित कराएंगे। ये व्याख्यान ऐसे प्रतिभावान लोगों के द्वारा होंगे जिन्होंने इस क्षेत्र में कुछ हासिल किया है और नाम कमाया है। कोरे गाल बजाने वाले अनुभवहीन वक्ताओं को हम घास नहीं डालेंगे।

व्याख्यानों के अलावा हम सिद्ध चापलूसों को आमंत्रित कर व्यवहारिक प्रशिक्षण की भी व्यवस्था करेंगे। ये प्रशिक्षक चापलूसी के उत्तम नमूने पेश करेंगे और प्रशिक्षणार्थियों से तुरन्त उनका अभ्यास करायेंगे।

लोचवर्धक प्रशिक्षण:- प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण पहलू शरीर के विभिन्न अंगों में आवश्यक लोच पैदा करना है। कई लोगों की रीढ़ सख्त होती है। उनकी कमर समर्थ लोगों के चरण-स्पर्श के लिए नहीं झुकती। हम उसमें इतनी लचक पैदा करेंगे कि ‘भाई जी’ के सामने आते ही उनकी रीढ़ बारह बजाने के बजाय चार या पांच बजाने लगेगी। हाथ की उंगलियों में भी इतनी फुर्ती पैदा करेंगे कि कमर झुकते ही उंगलियां ‘भाई जी’ की चरन-रज बटोरने लगे।

एक ज़रूरी काम जबड़े में इतनी लचक पैदा करना है कि ‘भाई जी’ के आते ही तत्काल ओंठ बिगस जाएं और बत्तीसी चमकने लगे। हम प्रशिक्षणार्थियों को ऐसा प्रशिक्षण देंगे कि अगर ‘भाई जी’ एक घंटा सामने बैठे रहें तो उनकी बत्तीसी बराबर एक घंटे तक चमकेगी। हमारी बात गलत निकले तो फीस के पूरे पैसे वापस। इसके साथ हम ‘भाई जी’ की हर मनोरंजक बात पर स्वाभाविक  ठहाके लगाने का भी अभ्यास देंगे।

बेशर्मी का प्रशिक्षण:- एक और ज़रूरी लक्ष्य प्रशिक्षणार्थियों में पर्याप्त बेशर्मी विकसित करना है। बिना उच्च कोटि की बेशर्मी के चापलूसी ठीक से सधती नहीं। समर्थ लोगों के घर घंटों बेज़रूरत बैठे रहना, शादी-ब्याह, मुंडन- कनछेदन में बिना बुलाये पहुंच जाना (‘हमारा घर है। निमंत्रण की क्या ज़रूरत?’), दुत्कारे जाने पर भी लौट लौट कर ‘भाई जी’ के द्वारे पहुंच जाना, बार-बार झिड़के जाने पर भी ‘भाई जी’ से चिपके रहना श्रेष्ठ चापलूस के ज़रूरी गुण हैं।

बेशर्मी की ट्रेनिंग के दौरान हम किसी चर्म-विशेषज्ञ की सहायता से प्रशिक्षण की समाप्ति तक प्रशिक्षणार्थी की चमड़ी की मोटाई में हुई वृद्धि की जांच करेंगे। चमड़ी पर्याप्त मोटी होने पर ही प्रशिक्षण पूर्ण माना जाएगा।

‘भाभी जी’ का महत्व:- चापलूस की नज़र में ‘भाभी जी’ का स्थान बहुत ऊंचा होता है। भाभी जी की अहमियत ‘एकहि साधे सब सधे’ वाली होती है। इसीलिए सिद्ध चापलूस ‘भाई जी’ की खुशामद में ज़्यादा वक्त ज़ाया न करके सीधे भाभी जी के दरबार में सलाम बजाता है। भाभी जी कृपालु हो गयीं तो ‘भाई जी’ कहां जाएंगे? भाभी जी के ‘दाहिने’ होते ही चापलूस का आधा मोर्चा फतह हो जाता है।

भाभी जी को खुश करने के लिए चापलूस को खासे पापड़ बेलने पड़ते हैं, जैसे समय-समय पर उनकी पसन्द की भेंटें देते रहना, बाज़ार से साग-सब्ज़ी ले आना, भाभी जी कहीं जाएं तो सेवक के रूप में ड्राइवर के बगल में बैठे रहना, गाड़ी बच्चों को लेने स्कूल जाए तो ड्राइवर के साथ जाकर बच्चों को ले आना, आदि। इसके अलावा भाभी जी के रूप-गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्हें लक्ष्मी-सरस्वती का ‘टू इन वन’ अवतार सिद्ध करना। बीच-बीच में भाभी जी को सुना कर आगंतुकों से कहना, ‘भैया, सवेरे से पच्चीस  तीस लोगों से मिल चुकी हैं। इतने ज्यादा लोगों से मिलेंगीं तो बेराम हो जाएंगीं। आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, देश का नुकसान होगा। आप लोग किसी और दिन आइएगा।’

भाइयो, ये हमारे प्रशिक्षण कार्यक्रम की मोटी मोटी बातें हैं। अब तक आपको महसूस हो गया होगा कि हमारे संस्थान की ट्रेनिंग कितने काम की है। हमारा निवेदन है की पढ़ाई लिखाई में बच्चों की ज़िन्दगी बर्बाद करने के बजाय उन्हें हमारे संस्थान में भेजें ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो। एक बार सेवा का मौका ज़रूर दें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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मूल्यवान मार्गदर्शन!😍

कुन्दन सिंह परिहार
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धन्यवाद, बिष्ट जी।