डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘उनकी गिरफ्तारी‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 295 ☆
☆ व्यंग्य ☆ उनकी गिरफ्तारी ☆
(व्यंग्य)व्यंग्य
वे सदल-बल विवादित स्थल पर जा रहे हैं। पब्लिसिटी काफी हो चुकी है। तीन-चार दिन से अखबार लगातार यही छाप रहे हैं कि वे जा रहे हैं।
जा रहे हैं तो क्या होगा? विवादित स्थल तक तो उन्हें पहुंचने नहीं दिया जाएगा। यह उन्हें भी मालूम है। बीच में ही कहीं गिरफ्तारी की औपचारिकता हो जाएगी। गिरफ्तारी में कोई मामूली आदमी की तरह हथकड़ी तो लगनी नहीं है। ऐसे ही मोटर में बैठा कर ले जाएंगे और दूर ले जाकर छोड़ देंगे। अखबार सारी कार्रवाई छाप देंगे और वे वापस हो जाएंगे। फिर अगले करतब की तैयारी होगी।
वे जा रहे हैं। काफिला साथ है। कार धीरे-धीरे जा रही है ताकि जनता देख ले कि वे उसके हित में लड़ने जा रहे हैं। बीच-बीच के गांवों में उनके दल के कार्यकर्ताओं ने स्वागत का इन्तज़ाम किया है। लोकप्रियता के प्रमाण के लिए स्वागत ज़रूरी है। सब कुछ हमेशा की तरह सुनिश्चित है। गांव की चार छः औरतें तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं, जैसे ‘लाम’ पर जा रहे हों। आठ दस आदमी ‘जिन्दाबाद जिन्दाबाद’, ‘नेताजी आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं’ के नारे लगाते हैं। वैसे नया कुछ नहीं है। नया यही है कि गिरती लोकप्रियता को नये सिरे से उठाना है।
विरोध का मुद्दा मिलता है तो विरोधी नेताओं को प्राण मिलते हैं। सत्ता पक्ष की गलती विरोध पक्ष की संजीवनी होती है। विरोध का मुद्दा न हो तो मंच पर किस बहाने से आयें, किस बहाने से भृकुटि तान कर गुस्से का इज़हार करें, किस बात को लेकर देश और समाज के प्रति अपना संताप व्यक्त करें? किस बात को लेकर आठ आठ आंसू रोयें?
सत्ता पक्ष ने मौका दिया है तो मौका चूकना नहीं है। राजनीति चौबीस घंटे की जागरूकता मांगती है। सावधानी हटी और लोकप्रियता घटी। जहां विरोध का मौका मिले, फौरन घंटा-घड़ियाल लेकर दौड़ो, धरना दो, प्रदर्शन करो और इस सबसे ज़रूरी यह कि भरपूर पब्लिसिटी करो। भले ही आपका चेहरा टमाटर और पेट काशीफल हो रहा है, लेकिन खाली पेट और सूखे चेहरों की बात करके लंबी आहें भरो।
तो वे जा रहे हैं। वे जानते हैं और सारा देश भी जानता है कि उन्हें घंटे दो घंटे के लिए गिरफ्तार होना है और फिर वापस होना है। मतलब यह है कि मामला सिर्फ प्रतीकात्मक है। उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी है। वे चोट खा जाएं तो सत्ता- पक्ष बदनाम हो जाएगा, और उन्हें सत्ता पक्ष की ज़्यादती साबित करने का एक और मौका मिलेगा। इसलिए इन्तज़ाम ऐसा है कि उन्हें कोई फूल से भी चोट न पहुंचा पाये।
वे जा रहे हैं और विवादित स्थल से पहले पुलिस वाले उनका इन्तज़ार कर रहे हैं। जिन-जिन नेताओं को अपनी लोकप्रियता की फिक्र है और जिनके सितारे गर्दिश में हैं, सब उनके साथ हैं। ऐसा मौका छोड़ने की चीज़ नहीं है।
पुलिस वालों के दिल में धुक-धुक हो रही है। वैसे वे सत्ता में नहीं हैं, लेकिन महत्वपूर्ण तो हैं ही। महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों की गिरफ्तारी लफड़े का काम है। ज़रा सी गुस्ताखी हो जाए तो चेले-चपाटे आसमान सिर पर उठा लेंगे। अखबारों में हंगामा करेंगे। और ऊपर वाले अफसरों पर कुछ संकट आया तो नीचे वाले इंस्पेक्टर का तबादला पक्का।
इसलिए धुकधुकी मचती है। नेताजी उनके पास पहुंचते हैं तो इंस्पेक्टर धीरे से बांह पर हाथ लगाकर मोटर की तरफ इशारा करता है, ‘उधर चलें, श्रीमान।’ नेताजी एकाध बार शहीदाना अन्दाज़ में कहते हैं, ‘नहीं, मुझे आगे जाना है।’ फिर पुलिस वालों के कष्ट का ध्यान करके गाड़ी में बैठने की कृपा करते हैं। उनका उद्देश्य पूरा हो चुका है। उनकी फौज भी थोड़ी नारेबाज़ी के बाद मोटर में सवार हो जाती है। नारेबाज़ी बराबर चालू रहती है। सबके नाम और फोटो अखबार में छपते हैं। अब विवादित स्थल पर जाकर क्या करना है?
यह देश का सौभाग्य है कि उसका हित चाहने वाले नेता बहुत हैं। बड़े नेता तो थोड़े हैं, छोटे इतने हैं कि हर झाड़ को हिलाने पर चार छः टपकेंगे। ‘होल टाइमर’ बहुत हैं। जो खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं वे राजनीतिज्ञों की सेवा और उनके संपर्क से अपना कल्याण कर रहे हैं और इस तरह देश का कल्याण कर रहे हैं, क्योंकि राष्ट्र का कल्याण व्यक्ति के कल्याण पर निर्भर होता है। अब हम उनकी देशभक्ति की तारीफ न करें तो यह हमारी एहसान-फरामोशी होगी।
ऐसे ही एक ‘होल टाइमर’ देश- सेवक को मैं जानता हूं। वे एक बड़े नेता के समर्पित चमचे रहे और उन्हीं के बल पर आतंक पैदा करके पूजा-अर्चना का प्रसाद प्राप्त करते रहे। फिर वे चम्मच से बढ़कर बोतल तक पहुंचे। दुर्भाग्य से उनके ‘धर्मपिता’ का पराभव हुआ और चमचे जी महल से लुढ़क कर सड़क पर आ गये। फिलहाल वे सड़क पर हैं, लेकिन क्या पता कब उन्हें फिर कोई ‘धर्मपिता’ मिल जाए और वे फिर देश सेवा करने की स्थिति में आ जाएं। राजनीतिक कब आपको उछाल दे और कब उखाड़ दे, जान पाना मुश्किल है।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






साधुवाद!🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।