श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है कवी – डा संजीव कुमार जी द्वारा लिखित “माधवी (खंड काव्य)…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 185 ☆
☆ “माधवी (खंड काव्य)…” – कवी – डा संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – माधवी (खंड काव्य)
कवी – डा संजीव कुमार
प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स, नोएडा
☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
महाभारत के माधवी-गालव प्रसंग पर लिखित डा संजीव कुमार के खंड काव्य माधवी की चर्चा मैं तीन कोणों से करना चाहता हूं। विज्ञान, वर्तमान स्त्री विमर्श के संदर्भ, और तीसरा मात्र महाभारत के कथा रूप में।
महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित “माधवी-गालव प्रसंग” विलक्षण गाथा है, जिसमें स्त्री के आत्मबलिदान, ब्रह्मतेज और पुरुष अहंकार के टकराव का चित्रण है। यह प्रसंग गालव ऋषि और ययाति की पुत्री माधवी के माध्यम से समाज की सत्ता-संरचना, गुरु-शिष्य परंपरा, और स्त्री की मर्यादा पर एक दार्शनिक विमर्श प्रस्तुत करता है।
गालव ऋषि, अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा स्वरूप “श्वेत अश्व, जिनके एक कान पर श्याम चिह्न हो, आठ सौ अश्व” ऐसे ही देना चाहते थे।
“अष्टशतानि मे देहि गच्छ गालव माम् चिरम्॥”
(महाभारत, उद्योग पर्व)
इस असंभव कार्य की पूर्ति हेतु जब गालव असमर्थ हुए, तब ययाति पुत्री माधवी ने आगे बढ़कर अपने अद्वितीय वरदान कुंवारीत्व को बार-बार पुनः प्राप्त करने की क्षमता का उपयोग करने की अनुमति दी।
यह तत्कालीन स्त्री स्वायत्तता का अनूठा उदाहरण है। माधवी तीन राजाओं हंस, दिवोदास और उशीनर से विवाह कर, प्रत्येक को एक वीर पुत्र प्रदान करती है। बाद में वह स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य के पथ पर वन लौट जाती है।
“प्रसुःत्यन्ते प्रसुत्रन्ते कन्यैव त्वं भविष्यसि॥”
(तू पुत्र जनने के पश्चात फिर से कन्या हो जाएगी)
इस प्रकार माधवी का चरित्र समर्पण और मौन प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता है। वह किसी की दासी नहीं, वरन् एक निर्णायक है, जिसने राष्ट्रों को वारिस दिए और फिर वन गमन को चुना। गालव का तप अंततः माधवी के त्याग के सहारे सफल होता है।
किंतु माधवी की व्यथा, उसका मौन, और उसका वनगमन एक प्रश्नचिन्ह बना कर पाठकों के अंतर्मन को झकझोर देता है।
“वैरम् व्रीवति वनम् धर्म बृह्मचर्येण संवृतम् ॥”
(उसने संसार त्याग वन को वरण किया, धर्म और ब्रह्मचर्य से युक्त होकर)
यह प्रसंग नारी की शक्ति और संवेदना का समन्वय है। माधवी ‘द्रौपदी’ की भांति प्रतिरोध नहीं करती, परंतु गांधारी की तरह उसका मौन ही युगों तक गुंजायमान है। यह कथा केवल स्त्री-पुरुष के संबंधों का आख्यान नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय और नैतिक विमर्श भी है जहाँ त्याग सबसे बड़ा धर्म बनता है और स्त्री, इतिहास की गूढ़ संचालक।
माधवी-गालव प्रसंग महाभारत के उन अध्यायों में से है जहाँ वैदिक ऋचाएँ, समाज का सत्य, और स्त्री का आत्म-बलिदान एक साथ गुंथे हुए हैं।
माधवी का प्रसंग आज के स्त्री विमर्श में एक गूढ़ और मार्मिक प्रतीक के रूप में उभरता है। वह महाभारत की एक ऐसी स्त्री है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है, भले ही वे पराकाष्ठा के स्तर पर त्यागमय हों। माधवी अपने वरदान का उपयोग गालव की सहायता हेतु करती है। उसका यह आत्म उत्सर्ग उसे ‘वस्तु’ नहीं, ‘कर्ता’ बनाता है।
वर्तमान स्त्री विमर्श में जब “एजेंसी”, “कंसेंट”, “बॉडी ऑटोनॉमी” तथा ” सेरोगेसी” जैसे विचार अति प्रबल हैं, जब लोकाचार बार बार तार तार हो रहे हैं, जब नव विवाहिताएं पति की हत्या करवा रही हैं, जब वासना पक्ष इतना प्रबल होता जा रहा है कि विवाहिता देशों की सीमाएं लांघकर ऑनलाइन प्रेमियों के पास भाग रही हैं, जब मर्यादा खंड कर सास दामाद के साथ भागने वाले कांड कर रही हैं तब माधवी की कथा यह प्रश्न उठाती है, कि क्या त्याग भी सशक्तिकरण हो सकता है? माधवी न तो विद्रोह करती है, न ही किसी मंच से भाषण देती है, परंतु उसका मौन, उसका निर्णय, उसकी तपस्या एक अदृश्य प्रतिरोध है।
आज की स्त्री अपने निर्णयों में स्वतंत्र होना चाहती है, चाहे वह करियर हो या मातृत्व। माधवी उस स्वतंत्रता की आदिम अभिव्यक्ति है। वह चार राजाओं से विवाह कर, पुत्र उत्पन्न कर, स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य धारण करती है, यह उसकी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता का प्रतीक है।
माधवी की गाथा कहती है कि स्त्री केवल करुणा नहीं, चेतना है। वह केवल पात्र नहीं, परिप्रेक्ष्य है।
डा संजीव कुमार ने इस परिप्रेक्ष्य को पुनर्जागृत किया है।
वे लिखते हैं
“माधवी दुखी थी
वह नहीं सोच पा रही थी
कि अपने जीवन को सफल समझे या असफल
यह तो जैसे
किराये की कोख बेचनेवाली बन गई थी वह
दो सौ घोड़ों के प्रतिकर पर।
मातृत्व किसी स्त्री का नया जीवन होता है
एक तो वह नौ महीने का गर्भधारण और असहनीय प्रसव पीड़ा से अपने तन का टुकड़ा संतान के रूप में जन्म देगी,
और फिर जुड़ जाता है उसका तन-मन उसका अस्तित्व अपनी संतान के लिए वह बारंबार उसे छाती से लगाती है उसे चूमती और अपना दूध पिलाती है।
माधवी दूध पिला रही है अपने नवजात
को
पर उसे छोड़कर जाना होगा यह संतान भी।
कवि की कल्पनाशीलता उनकी स्वयं की साहित्यिक स्वतंत्रता है।
हो सकता है, यदि मैं माधवी गालव प्रसंग पर लिखता तो शायद मैं माधवी के भीतर छुपी उस माँ को लक्ष्य कर लिखता जो बारम्बार अपनी कोख में संतान को नौ माह पालने के बाद भी लालन पालन के मातृत्व सुख से वंचित कर दी जाती है। गालव बार बार उसका दूध आंचल में ही सूखने को विवश कर उसे क्रमशः नये नये राजा की अंकशायनी बनने पर मजबूर करता रहा।
मैं भोपाल में मीनाल रेजीडेंसी में रहता हूं, सुबह घूमने सड़क के उस पार जाता हूं। वहाँ हाउसिंग बोर्ड ने जो कालोनी विकसित की है, उसका नामकरण अयोध्या किया गया है, एक सरोवर है जिसे सरयू नाम दिया गया है। हनुमान मंदिर भी बना हुआ है, कालोनी के स्वागत द्वार में भव्य धनुष बना है। मैं परिहास में कहा करता हूं कि हजारों वर्षों के कालांतर में कभी इतिहासज्ञ वास्तविक अयोध्या को लेकर संशय न उत्पन्न कर देँ।
दुनियां में अनेक स्थानो पर जहां भारतीय बहुत पहले बस गये हैं जैसे कंबोडिया, फिजी आदि वहां राम को लेकर कुछ न कुछ साहित्य विस्तारित हुआ है, कुछ स्थापत्य, नृत्य, लोक रचनाएं आदि देखने सुनने मिलती हैं और समय समय पर तदनुरूप चर्चायें विद्वान अपने शोध में करते रहते हैं। इसी भांति पढ़ने, सुनने से जो भ्रम निर्मित होते हैं उसका एक रोचक उदाहरण बच्चों की एक बहस में मिलता है। एक साधु कहीं से गुजर रहे थे, उन्हें बच्चों की बहस सुनाई दी। कोई बच्चा कह रहा था मैं हाथी खाउंगा, तो कोई ऊंट खाने की जिद कर रहा था, साधु का कौतुहल जागा कि आखिर यह माजरा क्या है, यह तो शुद्ध सनातनी मोहल्ला है। उन्होंने दरवाजे पर थाप दी, भीतर जाने पर वे अपनी सोच पर हंसने लगे दरअसल बच्चे होली के बाद शक्कर के जानवरों को लेकर लड़ रहे थे।
किसी महाकाव्य के अंश को नए स्वरूप में समग्र से काटकर देखने की सीमा होती है, जिससे ऐसे भ्रम बनते हैं, यह खतरा विद्वान साहित्यिक कृतियों में उठाते रहते हैं। यह सब मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि डॉ संजीव कुमार ने खण्ड काव्य माधवी को रचकर यह जोखिम उठाया है।
इससे पहले इसी प्रसंग पर कर्म भूमि से तपोवन तक उपन्यास भी मैने पढ़ा था जिसकी लेखिका संतोष श्रीवास्तव जी हैं।
दुनियां में विभिन्न संस्कृतियों में भौतिक साक्ष्य और समानांतर सापेक्ष साहित्य के दर्शन होते हैं। भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों से कहीं अधिक प्राचीन है। रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के दो अद्भुत महा ग्रंथ हैं। इन महान ग्रंथों में धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक, आध्यात्मिक और वैचारिक ज्ञान की अनमोल थाथी है। महाभारत जाने कितनी कथायें उपकथायें ढ़ेरों पात्रों के माध्यम से न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या के गुह्यतम रहस्यों को संजोये हुये है। परंपरागत रूप से, महाभारत की रचना का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है। धारणा है कि महाभारत महाकाव्य से संबंधित मूल घटनाएँ संभवतः 9 वीं और 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच की हैं। महाभारत की रचना के बाद से ही अनेकानेक विद्वान सतत उसकी कथाओ का विशद अध्ययन, अनुसंधान, दार्शनिक विवेचनायें करते रहे हैं। वर्तमान में अनेकानेक कथावाचक देश विदेश में पुराणो, भागवत, रामकथा, महाभारत की कथाओ के अंश सुनाकर समाज में भक्ति का वातावरण बनाते दिखते हैं। विश्वविद्यालयों में महाभारत के कथानकों की विवेचनायें कर अनेक शोधार्थी निरंतर डाक्टरेट की उपाधियां प्राप्त करते हैं। प्रदर्शन के विभिन्न माध्यमो में ढ़ेरों फिल्में, टी वी धारावाहिक, चित्रकला, साहित्य में महाभारत के कथानकों को समय समय पर विद्वजन अपनी समझ और बदलते सामाजिक परिवेश के अनुरूप अभिव्यक्त करते रहे हैं।
न केवल हिन्दी में वरन विभिन्न भाषाओ के साहित्य पर महाभारत के चरित्रों और कथानको का व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। महाभारत कालजयी महाकाव्य है। इसके कथानकों को जितनी बार जितने तरीके से देखा जाता है, कुछ नया निकलता है। हर समय, हर समाज अपना महाभारत रचता है और उसमें अपने अर्थ भरते हुए स्वयं को खोजता है। डा संजीव कुमार ने भी महाभारत पढ़ी, समझी, उसके ऐसे अनेक कथानक चुने और उन्हें वर्तमान से जोड़ते हुए किताबों पर किताबें रच डालीं। वे बधाई के सुपात्र हैं।
महाभारत पर अवलंबित हिन्दी साहित्य की रचनायें देखें तो डॉ॰ नरेन्द्र कोहली का प्रसिद्ध महाकाव्यात्मक उपन्यास महासमर, धर्मवीर भारती का अंधा युग, आधे-अधूरे, संशय की रात, सीढ़ियों पर धूप, माधवी (नाटक), शकुंतला (राजा रवि वर्मा), कीचकवधम, युगान्त, आदि जाने कितनी ही यादगार पुस्तकें साहित्य की धरोहर बन गयी हैं।
महाभारत से छोटे छोटे कथानक लेकर अनेकानेक रचनायें हुईं हैं जिनमें रचनाकार ने अपनी सोच से कल्पना की उड़ान भी भरी है। इससे निश्चित ही साहित्य विस्तारित हुआ है। किन्तु इस स्वच्छंद कल्पना के कुछ खतरे भी होते हैं।
उदाहरण स्वरूप रघुवंश के एक श्लोक की विवेचना के अनुसार माहिष्मती में इंदुमती प्रसंग में कवि कुल शिरोमणी कालिदास ने वर्णन किया है कि नर्मदा, करधनी की तरह माहिष्मती से लिपटी हुई हैं। अब नर्मदा के प्रवाह के भूगोल की यह स्थिति मण्डला में भी है और महेश्वर में भी है। दोनो ही शहर के विद्वान स्वयं को प्राचीन माहिष्मती सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। साहित्य के विवेचन विवाद में वास्तविकता पर भ्रम पल रहा है।
इस खंड काव्य का सारांश भूमिका में कथा सार के रूप में सुलभ है। महाभारत के उद्योग पर्व के अनुसार राजा ययाति जब अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाकर वानप्रस्थ ग्रहण कर चुके होते हैं तभी गालव उनसे काले कान वाले ८०० सफेद घोड़ों का दान मांगने आता है। ययाति जिनका सारा चरित्र ही विवादस्पद रहा है, वे अपने पुत्र से उसका यौवन ले सकते हैं, अपनी पुत्री माधवी के अक्षत यौवन का उपयोग कर सकते है। वे गालव को ऐसे विशिष्ट अश्व तो नहीं दे सकते थे, क्योंकि वे राजपाट पुरु दे चुके थे। अपनी दानी छबि बचाने के लिये वे गालव को अपनी अक्षत यौवन का वरदान प्राप्त पुत्री माधवी को ही देते हैं, और गालव को अश्व प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं कि माधवी को अलग अलग राजाओ के संतानो की माँ बनने के एवज में गालव राजाओ से अश्व प्राप्त कर ले।
यह सारा प्रसंग ही आज के सामाजिक मापदण्डों पर हास्यास्पद, विवादास्पद और आपत्तिजनक तथा अविश्वसनीय लगता है। मुझे तो लगता है जैसे हमारे कालेज के दिनों में यदि ड्राइंग में मैने कोई सर्कल बनाया और किसी ने उसकी नकल की, फिर किसी और ने नकल की, नकल की तो होते होते सर्कल इलिप्स बन जाता था, शायद कुछ इसी तरह ये असंभव कथानक किसी मूल कथ्य के अपभ्रंश न हों।
कभी कभी मेरे भीतर छिपा विज्ञान कथा लेखक सोचता है कि महाभारत के ये विचित्र कथानक कहीं किसी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्य के सूत्र वाक्य तो नहीं। ये सब अन्वेषण और शोध के विषय हो सकते हैं।
इतने अश्वों का विश्वामित्र जैसे तपस्वी करेंगे क्या? उनके आश्रम का तपोवन तो अश्वों से ही भर जाएगा। ” “
मेरा विज्ञान कथा लेखक इशारा करता है कि कही यह यूरेनियम का कोड वर्ड तो नहीं ? कहीं वे कोई अस्त्र तो नहीं बना रहे थे? खैर।
डा संजीव कुमार का यह एक और साहित्यिक सुप्रयास स्तुत्य है। यह उनकी साहित्यिक वर्दी पर एक और बड़ा तमगा है। मन झिझोड़ने वाला असहज कथानक है। स्वयं पढ़ें और स्त्री विमर्श पर तत्कालीन स्थितियों और आज के परिदृश्य का अंतर स्वयं आकलित करें।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





