श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 219 ☆

☆ वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

क्या आप मुझे जानते हो ? शरीर से आती आवाज सुन कर बेक्टो चौंका, ‘‘ नहीं तो ?’’

‘‘ मैं शरीर हूं. ’’ उस के शरीर से आवाज आई, ‘‘ चलो ! तुम्हें मैं अपनी आत्मकथा सुनाता हूं.’’ कहने के साथ उस ने लगातार बोलना शुरू किया. बेक्टो केवल गरदन हिलाहिला कर हांहां कहता रहा.

मेरे अंदर मस्तिष्क सब से महत्वपूर्ण अंग है. यह हजारों कंप्युटर जितनी सूचनाएं एकत्र कर सकता है. यह पूरे शरीर को अपने नियंत्रण में रखता है. किसे क्या काम करना है ?  कैसे करना है ? इन सब को यही दिशानिर्देश देता है.

दूसरा महत्वपूर्ण अंग आंख होती है. यह 2 मिली सैकण्ड में किसी भी चीज पर प्रतिस्थापित हो जाती है. किसी दृश्य को देखना इसी के द्वारा संभव है. हम ज्ञान का अधिकांश  भाग इसी के द्वारा अर्जित करते हैं.

तीसरा महत्वपूर्ण अंग फैफडे होते हैं. ये एक दिन में एक टेंकर से भी ज्यादा खून साफ कर के उसे पूरे शरीर में पंपा कर देते हैं. पूरे शरीर में आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाने में इसी खून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

हाथपैर हमारे चौथे महत्वूपर्ण अंग होते हैं. इस के द्वारा ही हम अधिकांश कार्य करते हैं. ये न हो तो हमारे अधिकांश कार्य बाधित हो जाए. इन अंग पर पाई जाने वाली एक इंच त्वचा में 72 फीट नव्र्स होती है.

कान हमारे पांचवे महत्वपूर्ण अंग है. इन के द्वारा हम ध्वनि सुन कर बोलना सीखते हैं. यदि ये न हो तो हम बोल नहीं सकते हैं. इसलिए जो व्यक्ति सुन नहीं पाता हे, वह बोल नहीं पाता है.

नाक हमारा छटा सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के बिना हम सूंघने में सक्षम नहीं हो सकते हैं. खुशबू और बदबू इसी से पता चलती है. ये नाक ही है जो हमारी सांस के रूप में जाने वाली हवा को साफ व शुद्ध करने का काम करती है.

मुंह हमारा सातवां सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के द्वारा हम बोलने और खाने का काम करते हैं. इस के अंदर उपस्थित मजबूत दांत 280 किलो तक का वजन सहन कर सकते हैं. दांत जितने दिखने में छोटे होते हैं उतने ही ज्यादा मजबूत होते हैं.

आठवें महत्वपूर्ण अंग हमारे निकास द्वार हैं. ये अंग हमारे शरीर के मलमूत्र को बाहर करते हैं.

उपरोक्त सभी अंग हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग है जो हमे दिखाई देते हैं. इन के अलाव भी कई अंग है. गला, छाती, पेट, पीठ, कमर, घुटने, पिंडली और बहुत कुछ. मगर,  सब से महत्वूपर्ण अंग में त्वचा भी शामिल है.

वैसे हमारे शरीर के पास पांच ज्ञानेंद्रिया है. नाक,  कान,  आंख, मुंह और त्वचा. जिन के द्वारा हम ज्ञानवर्धन करते हैं.

इतना कह कर शरीर चुप हो गया. बैक्टो को अपने स्कूल जाना था. वह चुपचाप स्कूल चला गया. उसे आज अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियो के बारे में लिखना था. शरीर की यह आत्मकथा सुन कर वह बहुत कुछ जान गया था. इसलिए वह खुश था. ‘‘ चलो ! आज मैं अपनी ज्ञानेंद्रियों के बारे में अच्छी तरह से लिख पाऊंगा.’’ 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

11- 05-2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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