डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘भाई हिम्मतलाल का संकट‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०२ ☆
☆ व्यंग्य ☆ भाई हिम्मतलाल का संकट ☆
भाई हिम्मतलाल ने लंबी उम्र भोगने के बाद एक दिन दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी आत्मा शरीर को छोड़कर सीधे दूसरे लोक को उड़ गयी।
आत्मा या रूह या ‘सोल’ के संबंध में खास बात यह है कि वह जीव के जन्म के समय से ही उच्चतम टेक्नॉलॉजी से युक्त रही है। आज के वैज्ञानिक अपनी उपलब्धियों की जो भी डींग मारें, आत्मा शरीर से अलग होते ही बिना किसी गाइडिंग मेकैनिज़्म और बिना किसी प्रोपेलर के उड़कर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को पार कर लेती है और मृतक के धर्म के अनुसार स्वर्ग,जन्नत या हैविन में पहुंच जाती है। आज के वैज्ञानिक अभी तक इस तरह का करिश्मा नहीं कर पाये हैं। आत्मा की इस विलक्षण क्षमता पर कोई शोध क्यों नहीं हुआ, यह ताज्जुब की बात है। ताज्जुब यह भी है कि वैज्ञानिकों ने सारे ग्रह खोज लिये, लेकिन वे आज तक यह पता नहीं लगा सके कि स्वर्ग,जन्नत या हैविन कहां स्थित है। ग़नीमत है कि इन में आदमी का भरोसा अब भी कायम है। बहुत से तो स्वर्ग या जन्नत की उम्मीद में ही जिल्लत भरी ज़िन्दगी काट लेते हैं।
तो भाई हिम्मतलाल की आत्मा ने जो उड़ान भरी तो सीधे एक विशाल गेट के सामने ब्रेक लगाया। हिम्मतलाल ने देखा, गेट के ऊपर अजनबी भाषा में कुछ लिखा था। सामने तीन-चार बन्दे खड़े थे। उनमें से एक ने झुक कर हिम्मत भाई को सलाम किया। बोला, ‘ख़ुशामदीद। तशरीफ़ लाइए।’
भाई हिम्मतलाल चक्कर में पड़ गये ।पूछा, ‘यह कौन सी जगह है भाई?’
बन्दा बोला, ‘यह जन्नत और दोज़ख का दरवाज़ा है। तशरीफ़ लाइए।’
हिम्मतलाल को झटका लगा,बोले,’ अरे भैया, हम दूसरे धरम के हैं। हम स्वर्ग या नरक में जाएंगे। लगता है हमारी आत्मा का सिस्टम गड़बड़ हो गया।’
बन्दा बोला, ‘नहीं हुज़ूर, ऐसा होना मुमकिन नहीं है। आप पांच मिनट यहीं तशरीफ़ रखिए। मैं दरयाफ़्त करके आता हूं।’
भाई हिम्मतलाल धड़कते दिल से वहीं बैठे रहे। थोड़ी देर में बन्दा वापस आ गया, बोला, ‘जनाब, मैंने आपका रिकॉर्ड चेक कर लिया है। आप सही जगह आये हैं। यहीं आपके कामों का हिसाब-किताब होगा।’
भाई हिम्मतलाल बोले, ‘अरे भाई, मेरा धरम दूसरा है। दूसरे धरम में ही पूरी जिन्दगी बसर की है। दूसरे धरम के हिसाब से ही शरीर का क्रिया-कर्म हुआ है। आप कैसी बातें करते हैं?’
बन्दा हंसकर बोला, ‘जनाब, आप भूल जाते हैं कि आपने पहली बीवी के रहते हमारा मज़हब अख़्तियार करके दूसरी शादी की थी, और उसके बाद आपने अपने पुराने मज़हब में लौटने की कोई कोशिश नहीं की।’
सुनकर हिम्मत भाई जैसे आसमान से गिरे। रिरियाकर बोले, ‘अरे भैया, पुराने धरम में कैसे लौटते? वहां पहली बीवी के रहते दूसरी शादी की इजाज़त नहीं है। वह दरवाज़ा तो अपने लिए बन्द हो गया था।’
बन्दा बोला, ‘अब तो आप समझ गये होंगे कि आपको यहां क्यों लाया गया है। आप हैसियतदार आदमी थे, इसलिए वहां घालमेल चल गया होगा। यहां दूध का दूध और पानी का पानी होगा। आप दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते थे।’
हिम्मत भाई दुखी होकर बोले, ‘तो अब मेरा क्या होगा?’
बन्दा बोला, ‘मेरे ख़याल से तो आपको दोज़ख में जाना पड़ेगा क्योंकि आपके रिकॉर्ड में लिखा है कि आपने अपनी पहली नेकबख़्त बीवी पर ख़ूब ज़ुल्म किये। उनके जज़्बात से खिलवाड़ किया। इसकी सज़ा तो आपको मिलेगी।’
हिम्मत भाई निरुत्तर होकर माथा पकड़ कर बैठ गये।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






