डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘धूल भरा हीरा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ धूल भरा हीरा ☆
रज्जू भाई बहुत दिन तक ठलुआगीरी करते रहे। पढ़ाई-लिखाई में रुचि रही नहीं, किसी तरह रो-झींक कर थर्ड डिवीज़न में बी.ए. पास कर लिया, फिर घर में बैठ गये। सवेरे दस ग्यारह बजे तक मुंह ढंक कर सोते, फिर उठकर चौराहे की तरफ निकल जाते। पान की दूकान पर परिचितों से बतयाते एक-दो घंटे निकल जाते। लौट कर दोपहर के भोजन के बाद फिर दो घंटे की निद्रा। फिर शाम को बाज़ार का एक चक्कर। घर में कोई उनसे मिलने आता तो पिताजी हाथ उठाकर कह देते, ‘वो पड़े हैं मरे। ‘ घर में रज्जू की कोई पूछ-कदर नहीं थी। बेहयाई की रोटी तोड़ रहे थे।
उनकी किस्मत उनके दोस्त धीरू की सलाह पर पलटी। उसने बताया कि नगर के विधायक चमन भाई अपने चुनाव प्रचार के लिए लड़कों को खरीद रहे हैं। करीब एक महीने का काम, मेहनताना दस हज़ार रुपये। नाश्ता भोजन अलग। बताया कि सौदा फायदे का है। उस समेत आठ दस लड़के बिक चुके हैं। रज्जू बिकने के लिए राज़ी हो गये। चमन भाई के सामने पेश हो गये। काम समझा दिया गया। तुरत काम पर लगने की हिदायत दी गयी।
रज्जू और दूसरे लड़कों की मेहनत के फलस्वरुप चमन भाई जीत गये और रज्जू उनकी नज़र में चढ़ गये। अब रज्जू रोज़ सवेरे जल्दी उठकर चमन भाई के दरवाज़े पर हाज़िरी देने लगे। दिन भर वहीं दौड़-भाग में लगे रहते। उनके परिवार की सेवा भी करते रहते। वे चमन भाई के विश्वासपात्र बन गये थे। चमन भाई किसी कार्यक्रम में जाते तो रज्जू को ड्राइवर के बगल में बैठा कर ले जाते। रज्जू भी घूम घूम कर लोगों को जताते कि वे चमन भाई के दाहिने हाथ होने का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। चमन भाई के मित्र-परिचित और पार्टी के लोग भी रज्जू को जानने लगे। रज्जू ने अपने स्कूटर पर सामने ‘विधायक प्रतिनिधि’ लिखवा लिया। अब जो लोग चमन भाई के बंगले पर किसी काम से आते, वे रज्जू भाई की जेब में सौ, दो सौ रुपये खोंस जाते।
कुछ दिन बाद रज्जू चमन भाई के बंगले के बाहर दफ्तर में, एक तरह से उनके सचिव बनकर, बैठने लगे। सब आने वाले पहले उन्हीं के पास आकर सलाम बजाते, फिर रज्जू चमन भाई से उनकी मुलाकात का जुगाड़ बैठाते।
रज्जू बाबू की हैसियत और कमाई में बराबर इज़ाफा होता गया। अब वे पार्टी में कुछ ऊंचा हासिल करने का ख्वाब देखने लगे थे। नगर में उनके फोन पर अधिकारी ध्यान देने लगे थे। दफ्तरों में घुसते ही उन्हें कुर्सी और सैल्यूट मिलने लगी थी। छोटे-मोटे अफसरों को रज्जू बाबू डांट पिला देते थे और अफसर चुपचाप सुन भी लेते थे।
अब घर में भी रज्जू बाबू का रोब- दाब बढ़ गया था। अब वे टाइम से सोते और अलार्म लगा कर टाइम से उठते। घर का कोई काम अटकता तो रज्जू के लिए पुकार लगती और रज्जू तुरत फोन उठाते। अब वे ‘काम’ के आदमी हो गये थे। अब घर में कोई उनसे मिलने आता तो पिताजी बहुत प्रेम और मुलायमियत से कहते, ‘उधर बैठे हैं। जाइए, मिल लीजिए।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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धन्यवाद, बिष्ट जी।