श्री अरुण श्रीवास्तव
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला “सबसे खास: हमारे बॉस”।)
☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – २ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
(मेरी यह लेखन श्रंखला किसी “विशेष व्यक्तिनुमा बॉस”की आलोचना के उद्देश्य से नहीं लिखी जा रही है, बल्कि इस पद से जुड़ी भ्रांतियों के उल्लेख से जुड़ी हैं।”समालोचना”ही सही जीवनशैली होती है, अभी यह श्रंखला लंबी चलेगी और इसमें हर तरह के रंग मिलेंगे, क्योंकि लोग शौक से, ध्यान से पढ़ रहे हैं और चाहते हैं कि ये सिलसिला जल्दी समाप्त न हो। उनकी राय मुझे व्यक्तिगत रूप से भी मिल रही है। अगर इन पोस्ट को पढ़कर हम सभी आनंदित हों तो समझिए कि गाड़ी सही दिशा में चल रही है और हम सेवाकाल रूपी नदी को पार कर दूसरे किनारे पर उतरकर खड़े हैं। हमारे सामाजिक जीवन में घटित या घट रही विसंगतियों पर चुटकी लेना, हर ईमानदार व्यंग्य लेखन का धर्म होता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की कलम की धार ने कभी समझौता नहीं किया, साहित्यिक संस्थाओं का सम्मान तो स्वीकारा पर शासकीय पुरस्कारों को हमेशा ही ठुकराया। इसलिए ही उनका स्थान साहित्य जगत और उनके पाठकों के दिलों में अविस्मरणीय बन गया है।)
इंग्लिश ग्रामर पढ़ाई जाती रही उस वक्त जब अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई शुरु होती थी, और यह पुण्य कार्य वे किया करते थे जिनका दिवस हम प्रतिवर्ष पांच सितंबर को मनाते हैं अर्थात शिक्षक दिवस। छात्र इस विधा में कितना प्रवीण हो पाये ये उनकी छड़ी,डांट,कलम बतलाती थी,पढ़ाना उनका दायित्व तो था पर एंड रिजल्ट उनके बस में नहीं था। उनके छात्र साल दर साल इस शिक्षण में क्या याद रख पाये और कितना भूल पाये ये उस वक्त उनके सामने आता है जब उनका पारा अपने बॉस से पड़ता है और ग्रामर सुधारने के नाम पर उनके बॉस का कर्तव्य बोध अक्सर जाग जाता है।
To change ‘has to have, may be to might be, will be to would be’ or vice versa is the favorite task of many Bosses however there are some good examples where some minor changes and rearrangement of sentences have glorified the draft letter. This talent should be compulsory to be a good Boss.
ड्राफ्टिंग ऐसा विषय है जिसकी कोई पढ़ाई नहीं होती, डिग्री नहीं होती,अत: यह एक जन्मजात प्रतिभा ही मान ली जाती है।लोग ये मान लेते हैं कि भाई ये तो इस काम में या सिर्फ इसी काम में मास्टर है तो क्यों न इसको काम पर लगाया जाये।लीव एप्लिकेशन ही ऐसी विधा है जो अपनी जरूरतों के कारण अपने आप सीखी जाती है। बैंक ने अपने सैनिकों की ड्राफ्टिंग के इस वीक पाइंट को समझते हुए ,और उनकी रणनीतिक क्षमता को वरीयता प्रदान बहुत से “फिल अप द ब्लेंक” वाले फार्मेट प्रचलन में लायें जिन्हें लोग आसानी से भरकर अपना और बैंक का भी काम कर सकें। “ऑब्जेक्टिव टेस्ट” जैसे खूबसूरत प्रतियोगिता प्रश्न पत्र अस्तित्व में आये जहां परीक्षार्थी को ए,बी, सी डी और none of the above में से किसी एक पर टिक लगा कर अपना ज्ञान कसौटी पर कसना पड़ता है।उनके लिये ये युद्ध क्षेत्र उनके मनमुताबिक बना जो लीव एप्लिकेशन के अलावा हर पत्र लिखने के दुरूह कार्य से कन्नी काटते रहे।
वाट्स एप की ईज़ाद भी ऐसे ही किसी सिद्धहस्त “वैज्ञानिक संत” ने की जो यह अच्छी तरह जानता था कि जिम्मेदारियां खिसकाने में हम लोगों का कोई मुकाबला नहीं है।”फारवर्डेड मैसेज” के दम पर दुकान सजाने और प्राप्त ज्ञान को जल्द से जल्द “खुद से दूर कर सही या सभी मित्रों और कलीग्स, रिश्तेदारों को भेजने की” जन्मजात प्रतिभा ने वाट्स अप को ऐसी ख्याति दी जिसका पृथ्वी के अस्तित्व में आने के बाद कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।
आज बस इतना ही क्योंकि मेरे मित्रों कलीग्स और रिश्तेदारों से अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं ये मेरी वाट या क्लास न लगा दें।अगली किश्त, स्थितियां तनावपूर्ण पर शांत होने पर आयेगी। अंतराल लंबा नहीं होगा यह पक्का है।
© अरुण श्रीवास्तव
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