डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०५ ☆
☆ व्यंग्य ☆ उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा ☆
‘अखिल भारतीय उत्कोच-स्वीकारक महासंघ’ की एक आपात्कालीन बैठक हुई। कारण यह था कि रिश्वतखोरी का एक मामला सनसनीखेज़ हो गया था। यों तो रिश्वतखोरी अब सनसनीखेज़ रही नहीं। रिश्वतखोरी में पकड़े जाने की कोई खबर छपे तो लगता है अखबारों को खबरों का टोटा पड़ गया।
लेकिन इस बार मामला सनसनीखेज़ इसलिए हो गया कि एक आदमी सामान्य कुर्ता, धोती, जूते पहने एक दफ्तर में घुसा। जब बाहर आया तो कपड़े जूते गायब थे। सिर्फ चड्डी बाकी थी। यह भी सामान्य बात थी, ऐसा तो होता ही है। लेकिन बाहर खड़े चपरासी ने झपटकर उसकी चड्डी भी उतार ली। आदमी मादरज़ात नंगा हो गया। कोई शर्मदार आदमी था। लगता है रिश्वत के अदब- कायदे का अभ्यास नहीं था। वह पच्चीस कदम दूर नीम के पेड़ तक गया और वहीं ढेर हो गया। उसका हार्टफेल हो गया। इस युग में शर्मदारों का यही हश्र होता है।
बात ने तूल पकड़ा। अखबारों ने मामले को उछाला। लिखा कि अब हद हो गयी, पानी सर के ऊपर से गुज़र गया, रिश्वतखोरी कोढ़ है, कैंसर है, समाज के लिए अभिशाप है, वगैर:वगैर:। वही बातें जो सदियों से दुहराई जा रही हैं।
मजबूरन ‘अखिल भारतीय उत्कोच- स्वीकारक महासंघ’ की कार्यकारिणी की आपात्कालीन बैठक बुलायी गयी।
महासंघ के अध्यक्ष पवित्र नारायण बोले, ‘भाइयो, यह बैठक बुलाने का कारण यह है कि हमारे समाज-सेवा के काम में एक बाधा उत्पन्न हो गयी है। एक आदमी हमारे महासंघ के सदस्यों से सेवा प्राप्त करके कार्यालय से बाहर निकला और वहीं स्वर्गवासी हो गया। वैसे मृत्यु से बढ़कर मामूली और अनिवार्य घटना मनुष्य के जीवन में दूसरी नहीं है। फिर, जहां सौ काम सफलता से होते हैं वहां एकाध गड़बड़ी भी होती है। लेकिन अखबार वाले खामखां मामले को उछाल रहे हैं। हमें बदनाम कर रहे हैं। इसीलिए यह बैठक बुलायी है कि हम विचार करें कि अपने काम करने के तरीके में कौन सा परिवर्तन करें कि इन ऐरे-गैरे लोगों को मुंह खोलने का मौका न मिले।’
कार्यकारिणी के एक सदस्य दयाराम बोले, ‘इस बात का क्या प्रमाण है कि वह आदमी रिश्वत देने के कारण मरा? हो सकता है उसे रक्तचाप या दिल की कोई बीमारी रही हो।’
पवित्र नारायण बोले, ‘पोस्टमार्टम से यह बात पता चली है कि वह किसी रोग का रोगी नहीं था। वह अकस्मात मानसिक धक्के से मरा।’
दूसरे सदस्य दीनानाथ बोले, ‘यह कहां साबित होता है कि वह मानसिक धक्का रिश्वत का ही था? हो सकता है उसे किसी पारिवारिक समस्या या दुश्चिंता का धक्का लगा हो।’
महासंघ के महासचिव करुणानिधान बोले, ‘अरे भई, बेपर की मत हांको। सब ने उसे दफ्तर से नंगे निकलते और मरते देखा।’
दयाराम और दीनानाथ चुप हो गये। अध्यक्ष पवित्र नारायण का जीवन उत्कोच की कृपा से सभी सिद्धियों और फलों से भर चुका था। एक तरह से वे अघा चुके थे। बोले, ‘मेरे खयाल से हमारे कुछ सदस्य आजकल अति करने लगे हैं। कई लोग रातों-रात करोड़पति बन जाना चाहते हैं। इसीलिए हमारे महासंघ की बदनामी होती है। मैं सोचता हूं अब हमें कुछ समय के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए कि लोगों को यह भ्रम हो कि हमें राष्ट्र की चिन्ता है। हमारे ऊपर जो कीचड़ उछाला जा रहा है उसे साफ करना भी ज़रूरी है। इस संबंध में मैं आपसे सुझाव आमंत्रित करता हूं।’
कार्यकारिणी के एक सदस्य धर्मदास काफी रिश्वत खा चुकने के बाद अब धीरे-धीरे अध्यात्म की ओर मुड़ रहे थे। वे उठकर बोले, ‘मेरा सुझाव है कि हमें गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों से रिश्वत लेना बन्द कर देना चाहिए।’
एक दूसरे सदस्य नेकराम चिढ़ कर बोले, ‘तुम रहे मूसर के मूसर। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की लिस्ट कहां से लाओगे? फिर हमारे देश में यह खराब प्रवृत्ति है कि एक वर्ग को जो सुविधा दी जाए वह दूसरे वर्ग भी मांगने लगते हैं। उससे हम भारी संकट में पड़ जाएंगे। हम हमेशा समानता और गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर चले हैं और उन्हीं पर अटल रहेंगे।’
‘मूसर’ संबोधन से नाराज़ होकर धर्मदास नेकराम से उलझ गये। थोड़ी देर तूतू- मैंमैं हुई। अध्यक्ष महोदय ने उन्हें शान्त किया।
नेकराम खड़े होकर बोले, ‘मेरे खयाल से तो हमें अपनी कार्य प्रणाली में परिवर्तन करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हर मिनट हजारों लोग मरते हैं, इसके लिए विचलित होने की ज़रूरत नहीं है। हमारा तौर तरीका ठीक है इसीलिए हमारी सदस्य-संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी हुई है। जो रिश्वत नहीं लेता उस पर लोग हंसते हैं। इसलिए मेरी समझ में तो इस बैठक की ही कोई ज़रूरत नहीं थी। वी आर सिंप्ली वेस्टिंग अवर प्रेशस टाइम। इतनी देर में तो हम जनता के सहयोग से दस बीस हजार रुपये खड़े कर लेते।’
पवित्र नारायण सिर हिला कर बोले, ‘नहीं नहीं, कुछ न कुछ तो करना होगा। मेरे खयाल से हम सरकार को प्रस्ताव भेजें कि हम रिश्वतखोरी छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते कि सरकार हमें वैसा ही ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ दे जैसा वह प्राइवेट प्रैक्टिस न करने वाले डॉक्टरों को देती है।’
दयाराम बोले, ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस किस आधार पर तय होगा?’
अध्यक्ष ने जवाब दिया, ‘पद के हिसाब से तय हो जाएगा।’
नेकराम अपना हाथ उठाकर बोले, ‘मुझे इसमें एतराज़ है। मैं अफसर न होते हुए भी किसी अफसर से ज्यादा रिश्वत पैदा करता हूं। इसलिए पद के हिसाब से अलाउंस लेने के प्रस्ताव को मैं तुरंत रिजेक्ट करता हूं।’
अध्यक्ष महोदय सोच में पड़ गये। बोले, ‘अच्छा तो फिलहाल ऐसा करते हैं कि महासंघ की ओर से ‘उत्कोच त्याग पखवाड़ा’ घोषित करते हैं। इस पखवाड़े में कोई सदस्य रिश्वत नहीं लेगा। इस पखवाड़े का जोरदार प्रचार किया जाए।’
दीनानाथ बोले, ‘कोई अपनी मर्जी से दे तब भी न लें?’
अध्यक्ष बोले, ‘बिलकुल नहीं।’
दीनानाथ का मुंह बिगड़ गया।
एक और घाघ सदस्य दस्युदास चुपचाप बैठे मुंह में पान की जुगाली कर रहे थे। रिश्वत लेने के मामले में वे घोर सिद्धांतवादी थे। बाप का काम भी बिना रिश्वत लिये नहीं करते थे। उन्हें अब तक की सारी बातें निरर्थक और हास्यास्पद लग रही थीं।
एकाएक वे चोंच ऊपर उठाकर बोले, ‘हम फालतू बातों में अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हैं। आज की बैठक में हमें सिर्फ उस महान आदमी की मौत का शोक करना चाहिए जो हमारा कल्याण करते हुए काम आया। बेचारा कमज़ोर दिल का था। ऐसे कमज़ोर दिल वालों को आज की दुनिया में जन्म नहीं लेना चाहिए। सब लोग उठें और एक मिनट का मौन धारण करके दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।’
अध्यक्ष महोदय प्रस्ताव से निरुत्तर हो गये। सब उठकर आंख मूंद कर खड़े हो गये। एक मिनट तक ईश्वर से प्रार्थना करते रहे कि वह सब प्राणियों को रिश्वत का धक्का सहने की शक्ति प्रदान करे।
मौन के बाद दस्युदास बोले, ‘हम एक शोक-प्रस्ताव दुखी परिवार को भेजें। सुना है मरने वाला पांच हजार रिश्वत देकर मरा था। भला आदमी था। महासंघ उसके प्रति कृतज्ञ है। मेरा प्रस्ताव है कि उस पांच हजार में से दो हजार रुपया सहानुभूति-राशि के रूप में दुखी परिवार को दिया जाए और इस बात का बाकायदा प्रचार हो ताकि हमारे महासंघ के बारे में लोगों के भ्रम दूर हों।’
यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हो गया। दस्युदास आगे बोले, ‘शोक प्रस्ताव के बाद कोई कार्यवाही नहीं होती, इसलिए आज की बैठक समाप्त की जाए। पखवाड़ा अखवाड़ा मनाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए दो-चार माह बाद फिर बैठक रखी जाए।’
फिर एक आंख दबाकर बोले, ‘तब तक मामला ठंडा भी हो जाएगा।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






