स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५१ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २
(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)
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का हू है जा देह को, चल दें जब प्रान ।
जिन्दै पै तौ पूछ लो, फिर देऔ अस्थान ||
कनक-भवन में हो रओ, मदन महोत्सव आज ।
बिन न्यौते के आ जुरै, भृंग कुरंग समाज ।।
सीस समारे तीन घट, पनघट पे नट जाय ।
एक घूँट में बावरी, तौरो का घट जाय ||
कुच-कुरंग सहमे डरे, घर लइ सेंत कुलाँच |
मदन-अहेरी ने भरी, रोम कूप में आँच ||
बिरछ कलपतरु बिलसरओ, पैरें अंगिया सैत ।
लगीं चिरैयां चहकने, देख देख पर हेत ।
केस कसाई हो गये, कस कस मारे ज्यान ।
बाँद बूँदे धर दये, आदे दूदे प्रान ॥
काजर आदर पा गओ, भओ भाल सिंगार ।
मन मुतियन सो डुल रओ, कब से रओ निहार ।।
कमल कुसुम की करतां, आर्के करै किलोल ।
भौरं भीर भ्रम में परै, ऐसे लोल कपोल ||
तनक मनक झाँकें झकें, ताकें मनों पिनाक ।
आँक बाँक कैं सब गये, नाक सके ना नाक ॥।
चिबुक चिबक कैं रै गओ, करन लगो अरदास ।
नैन नगरिया दूर है, मोय बसा लो पास ||
हाँतन की सोमा गजब, उँगरिन झरै अँजोर ।
सुपयारे कारे परें, नौ देवै झकझोर ॥
संपत जैसे सूम की पिछवाड़े दब जाय ।
वैसइ देख नितम्ब-धन, खियाल चित्त में आय ।।
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© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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