डॉ राकेश ‘चक्र’
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।
आप “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६७ ☆
☆ बाल कहानी – कृष्णावतार की कविता में कहानी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆
(नाना से सुनी कृष्णावतार की कविता में कहानी)
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गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं थीं। अर्णव और सोनी अपनी नानी के घर आए हुए थे।
वे जब भी नाना-नानी के घर आते, तब दोनों ही अपने नाना और नानी से जीभरकर बातें करते। कभी अपने स्कूल की बातें बताते, तो कभी दोस्तों की। लेकिन दोनों ही कहानी सुनने के बहुत शौकीन थे। वे कभी नाना के पास सोते, तो कभी नानी के। उनके नाना और नानी नई-नई कहानियाँ सुनाते।
एक दिन वे अपने नाना जी के साथ सोने आए, तब अर्णव बोला, ” प्यारे नाना मुझे भगवान कृष्ण की कहानी सुनाओ न।”
तभी सोनी बोल पड़ी, ” हाँ नानाजी मुझे भी भगवान कृष्ण की कहानी सुननी है।”
प्यारे बच्चो तुम्हें आज भगवान कृष्ण की कहानी कविता में सुनाता हूँ।”
“क्या कहा कविता में कहानी नानानी।” सोनी ने चोंकते हुए पूछा।
“हाँ बच्चो कविता में कहानी, आपको सच में बहुत पसंद आएगी।
हमारे मित्र चक्र ने कविता में पूरी कहानी लिखी है, सुनाता हूँ, जिनकी लिखीं कुछ लिखीं किताबें आपको दी थीं न।”
“हाँ-हाँ हम समझ गए। हमें उनकी किताबें बहुत अच्छी लगीं।” दोनों ही समवेत स्वर में बोले।
“देखो बच्चो ध्यान से सुनना। हुंकारे भरते रहना। कहीं सो मत जाना कहानी सुनते-सुनते।”
दोनों समवेत स्वर में बोले, “नहीं, नहीं नानाजी। आप जल्दी से सुनाइए न!”
“बच्चो अब सुनो कविता में पूरी कहानी ध्यान से- बच्चो इस कहानी का शीर्षक है –कृष्णावतार और मुन्ना जी“
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“बोला मुन्ना मातु से, कृष्ण लिए अवतार।
कैसे जन्मे कृष्ण जी, मुझे बताओ सार ।।
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सुनो पुत्र पावन कथा, श्री कृष्ण भगवान।
अपने ही वरदान से, दिया देवकी – मान।।
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उग्रसेन ने पुत्र का, नाम रखा था कंस।
अतिशय ही वह क्रूर था, देता सबको दंश।।
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उग्रसेन राजा हुए, मथुरा ब्रज के धाम।
वे उदार प्रभु भक्त थे, करते जनहित काम।।
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उग्रसेन के भ्रात थे, देवक उनका नाम।
पुत्री उनकी देवकी, जने उसी ने श्याम।।
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हुआ ब्याह वसुदेव से, जो कुंती के भ्रात।
मंत्री मथुरा राज के, बँधी देवकी साथ।।
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विदा हुई जब देवकी, रथ को हाँके कंस।
बहुत खुशी था आज वह, जैसे मानस हंस।।
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रथ लेकर आगे बढ़ा, आई यह आवाज।
कंस काल सुत आठवाँ, छीने तेरा ताज।।
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जैसे ही उसने सुना, बहना का सुत काल।
गुस्से में वह भर गया, हुआ चेहरा लाल।।
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तुरत – फुरत वापस हुआ, डाला उनको जेल।
जंजीरों में जकड़कर, नहीं करा फिर मेल।।
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उग्रसेन क्रोधित हुए, किया कंस प्रतिरोध।
कंस न माना एक भी, भूल गया सब बोध।।
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कैद किए अपने पिता, डाला कारागार।
मद, घमण्ड में भूलकर, खूब किया प्रतिकार।।
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राजा मथुरा का बना, बढ़ गए अत्याचार।
मनमानी वह नित करे, बढ़े पाप के भार।।
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भद्र अष्टमी व्योम घन, छाईं खुशी अपार।
मातु देवकी गर्भ से, हुआ कृष्ण अवतार।।
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पुत्र आठवें कृष्ण थे, सत्य हुई यह बात।
बरसे जमकर मेघ तो, थी अँधियारी रात।।
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ताले टूटे जेल के, हुआ कृष्ण अवतार।
प्रहरी सोए नींद में, मातु कर रही प्यार।।
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वासुदेव गोकुल चले, सुत को लेकर साथ।
शेषनाग अवतार ने, ढका कृष्ण का गात।।
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यमुना जी भी घट गईं, किया कृष्ण को पार।
घर आए वह नन्द के, प्रभु की कृपा अपार।।
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लिटा पलँग पर कृष्ण को, हो वसुदेव निहाल।
प्रभु की लीला चल रही, अदभुत मायाजाल।।
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मातु यशोदा नींद में, रिमझिम है बरसात।
बेटी उनकी साथ ले, लौटे रातों – रात।।
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जन्मे माता रोहिणी, सुंदर से बलराम।
जग में प्यारे नाम हैं, बलदाऊ औ’ श्याम।।
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धन्य यशोदा हो गईं, पाकर के गोपाल।
गोकुल में खुशियाँ बढ़ीं, उच्च नन्द का भाल।।
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अत्याचारी कंस के, बढ़े पाप आचार।
चली एक कब कंस की, ईश लिए अवतार।।
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बलदाऊ सँग कृष्ण ने, किए अनेकों खेल।
गोकुल रसमय हो गया, बढ़ा प्रेम अरु मेल।।
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गाय चराईं कृष्ण ने, ग्वालों के नित संग ।
कभी चुराते मधु, दही, सभी देखकर दंग।।
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मिश्री, माखन, दही प्रिय, उनको भाए खूब।
रोज करें नाटक नए, कभी न आए ऊब।।
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हँस – हँस बीता बालपन, किए चमत्कृत काम।
देख चकित गोकुल हुआ, मनमोहन – बलराम।।
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कंस किया मलयुद्ध को, मिला निमंत्रण श्याम।
साथ – साथ दोनों चले, कृष्ण और बलराम।।
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छोटे से ही कृष्ण ने, मल्ल भी दिए पछाड़।
अत्याचारी कंस को, दिया उसी दिन मार।।
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कैद से छूटे मातु – पित, और नानु उग्रसेन।
खुशियाँ घर – घर बढ़ गईं, प्रेम में भीगे नैन।।
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मातु देवकी खुश बहुत, और पिता वसुदेव।
कृष्ण सभी को प्रिय हैं, हैं देवों के देव।।
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मुन्ना भी खुश बहुत था, सुनकर कृष्णावतार।
भक्तों का करते रहे, सदा कृष्ण उद्धार।।
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“बच्चो कैसी लगी कविता में कहानी।”
तभी अर्णव बोला, ” मुझे तो बहुत ही सुंदर लगी।”
सोनी भी कहाँ चुप रहने वाली थी, वह भी बोली, ” नानाजी इतने सरल शब्दों में इत्ती अच्छी कहानी, मुझे तो बहुत पसंद आई है। मैं तो याद करके कृष्णजन्माष्टमी पर अबकी बार स्कूल में सुनाऊँगी।”
“अरे वाह सोनी, क्या बात है? बच्चो मुझे तो नींद आने लगी है, अब आप दोनों भी सो जाओ। पाँच बार गायत्री मंत्र का सुनाते-सुनाते।”
तीनों ही गायत्री समवेत स्वर पढ़ने लगते हैं—
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात —“
“बच्चो इस मंत्र का अर्थ हिंदी में याद है न।”
“हाँ नाना जी मुझे याद है। आपने ही तो याद कराया है। मुझे तो गायत्री मंत्र बोलकर बहुत अच्छी नींद आती है।” सोनी बोली।
अर्णव बोला, “मुझे भी। डरावने सपने भी नहीं आते कभी।”
“अच्छा एक बार दोहरा लेते हैं- हे प्रभु आप प्राण स्वरूप हैं, आप दुःखनाशक हैं, आप पापनाशक हैं, आप मेरी अंतरात्मा में धारण कर मुझे अच्छे रास्ते पर चलाते रहिए।”
बच्चो अब लाइट बंद करता हूँ, “शुभरात्रि बच्चो।”
“शुभरात्रि नाना जी!”
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© डॉ राकेश चक्र
(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




