डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘अपराध‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०६ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ अपराध ☆
मेहता साहब रिटायर हो गये। अब ज़रुरी हो गया कि ज़िन्दगी का अपना अलग ख़ाका बनायें ताकि बाकी ज़िन्दगी ठीक से बसर हो सके। रिटायर होने से पहले ज़िन्दगी का नियोजन नहीं किया था, इसलिए सहसा दिक्कत महसूस हुई। दोनों बेटे जब काम पर चले जाते हैं तो उन्हें महिलाओं के बीच फालतू रहने में परेशानी होती है। शायद धीरे-धीरे आदत हो जाए।
सवेरे घूमने चले जाते हैं। रास्ते में दूसरे रिटायर्ड लोग मिल जाते हैं। बातें होती हैं। लेकिन बातें ज़्यादातर बुढ़ापे के रोगों पर केन्द्रित होती हैं— गठिया, रक्तचाप, अपच, आंखों की तकलीफ़। कभी राजनीति पर बातचीत हो जाती है। एक दो लोग ऐसे हैं जो अपने नाती-पोतों की चर्चा करके आल्हादित होते रहते हैं, या फिर बेटे- बहू की बुराइयों का पुराण खोलकर बैठ जाते हैं।
मेहता साहब अभी चुस्त हैं। उनका शरीर अभी थका नहीं है। वे अक्सर सोचते हैं सरकार को रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी चाहिए, या फिर आदमी की सेहत देखकर रिटायर करना चाहिए। जब देश में औसत आयु बढ़ गयी तो रिटायरमेंट की उम्र उतनी ही बनाये रखने में कोई तुक नहीं।
सवेरे उठकर वे सैर से पहले कमरा बन्द करके हल्की वर्जिश कर लेते हैं। शरीर के सब हिस्से-पुर्ज़े अभी ठीक काम करते हैं। बालों की सफेदी और चेहरे की हल्की झुर्रियों जैसी बाहरी तब्दीलियां ज़रूर हैं, लेकर भीतर से चुस्ती और काम करने की ताकत बरकरार है।
इसीलिए मेहता साहब दिन में पलंग पर कम ही लेटते हैं। घर में इधर-उधर घूमते रहते हैं। कमरे की सफाई कर लेते हैं। काम में पत्नी और बहुओं की मदद कर देते हैं। फूलों-पौधों की देखभाल कर लेते हैं।
लेकिन उन्हें महसूस होता है कि इतना सब काफी नहीं है। इस सब के बाद भी ऊब लगती है। भीतर से बेकारी का बोध होता है। शरीर बेकार होने तक नौकरी या व्यापार जैसा कोई काम करना ज़रूरी है। उन्हें अभी किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। आराम से कहीं भी आ-जा सकते हैं, बस में उतर-चढ़ सकते हैं, सड़कें पार कर सकते हैं। फिर घर में बैठे रहने का क्या मतलब?
उन्होंने घर के सदस्यों को बताये बिना विज्ञापन देखना शुरू किया। ज़्यादा खोज- बीन नहीं करनी पड़ी। उन्होंने देखा कि स्थानीय कंपनियों के बहुत से विज्ञापन रोज़ निकलते हैं— मैनेजर के लिए, एकाउंटेंट के लिए, क्लर्क के लिए। वे एकाउंट्स ऑफिसर के पद से रिटायर हुए थे, इसलिए उन्होंने महसूस किया कि एकाउंटेंट का काम पा जाना मुश्किल नहीं है। इतना अनुभवी आदमी भला कंपनी को कहां मिलेगा?
उन्होंने बिना किसी को जानकारी दिये अर्ज़ी भेज दी। सोचा, नौकरी मिल गयी तो सब लोगों को ‘सरप्राइज़’ देंगे। जल्दी ही कंपनी से जवाब भी मिल गया। उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।
निश्चित तिथि पर मेहता साहब पुराने ऑफिस जाने का बहाना करके पुरानी नौकरी का प्रमाण-पत्र लेकर घर से निकल गये। साफ कमीज़ पैंट पर टाई लगाये वे इस उम्र में भी ‘स्मार्ट’ लग रहे थे।
कंपनी के दफ्तर में पहुंचे तो देखा वहां तीस चालीस लोग इकट्ठे थे। कुछ भीतर कमरे में बैठे थे, कुछ हाथ में फाइल लिए बाहर घूम रहे थे। मेहता साहब को आश्चर्य हुआ। एक जगह के लिए इतने उम्मीदवार। कमरे में देखा तो वहां उन जैसे पकी उम्र के तीन लोग और दिखे। बाकी सब नौजवान थे। बुज़ुर्गों में से एक ने खिसक कर उन्हें बैठा लिया। मेहता साहब ने बैठकर आसपास के लोगों पर नज़र फैलायी।
उन्होंने देखा, ज़्यादातर लोगों के चेहरे पर मायूसी का भाव था। लगता था वे पहले भी नौकरी के मोर्चे पर टकराकर शिकस्त खा चुके हैं। कई टाइयां लगाये थे, लेकिन साफ लगता था कि उन्हें टाइयां पहनने की आदत नहीं है। कई टाई बांथे थे, लेकिन उनकी कमीज़ों के कॉलर गन्दे और छिने हुए थे।
जल्दी ही इंटरव्यू शुरू हो गये और एक-एक कर उम्मीदवार अन्दर जाने लगे।
मेहता साहब के पास एक सांवले रंग का दाढ़ी वाला युवक बैठा था। वह मामूली कमीज़-पैन्ट और पैरों में सस्ते काले जूते पहने था। वह अपने आसपास के नौजवानों से लगातार ऊंचे स्वर में बात कर रहा था। मेहता साहब को उसके बात करने के ढंग से कुछ तकलीफ महसूस हुई क्योंकि उसमें उस शिष्टता और नफ़ासत का अभाव दिखता था जिसकी अपेक्षा वे हर आदमी से करते थे।
मेहता साहब के कानों में उसकी बातें पड़ीं। वह कह रहा था— ‘नौकरी मिलेगी ठेंगा। आपका कोई माई-बाप है क्या? अभी किसी का फोन आ जाएगा और बस, बाकी लोग अपनी फाइल झुलाते वापस। बस यही करते रहो। कोई साला बस का किराया देने वाला भी नहीं। नौजवान इस देश के भविष्य हैं न। हमीं इस देश के भावी कर्णधार हैं।’ वह व्यंग्य से हंसा।
मेहता साहब उसकी बात सुनकर सिकुड़ गये। वह बार-बार उन चारों रिटायर्ड लोगों पर नज़र डाल रहा था।
थोड़ी देर में वह उन लोगों से मुखातिब होकर बोला, ‘आप लोग भी इसी नौकरी के लिए आये हैं?’
मेहता साहब ने सिर हिलाया कहा, ‘हां।’
उसने उसी तरह बेलिहाज पूछा, ‘आप लोग रिटायर्ड हैं?’
मेहता साहब ने फिर सहमति में सिर हिलाया।
उस नौजवान के नथुने फड़कने लगे। सख़्त आवाज़ में बोला, ‘आप लोगों ने तो जिन्दगी भर नौकरी कर ली। सब सुख उठा लिये। बाल- बच्चों को नौकरी पर भी लगा दिया होगा। अब यहां हमारे पेट पर लात मारने क्यों आ गये आप? पेंशन तो मिलती होगी?’
मेहता साहब मिनमिना कर बोले, ‘बिज़ी रहना ज़रूरी है। जब तक शरीर ठीक है कुछ न कुछ काम तो करना होगा।’
नवयुवक उसी तेज़ी से बोला, ‘मुहल्ले के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दीजिए, समाज सेवा का काम कीजिए, घर में बागवानी कीजिए। पैसा तो मिला होगा ही। कोई फार्म खरीद कर खेती कीजिए।’
मेहता साहब के बगल में जो रिटायर्ड सज्जन थे उनका जाति-नाम तम्हाने था।अब तक मेहता साहब का परिचय सभी रिटायर्ड लोगों से हो चुका था। तम्हाने साहब नौजवान की बात पर उखड़ गये। अंग्रेजी में बोले, ‘यह हमारा निजी मामला है। तुम हमें उपदेश देने वाले कौन हो?’
नौजवान पलट कर बोला, ‘ठीक कहते हो। खा जाओ, पूरी नयी पीढ़ी को हजम कर जाओ। तुम सौ साल तक जिन्दा रहो और हमें पचास तक पहुंचना भी मुश्किल हो।’
फिर वह अपना हाथ घुमा कर बोला, ‘देख लो, इन नौजवानों में से कितने अभी से बूढ़े दिखने लगे हैं।’
मेहता साहब चुप्पी साधे बैठे थे। सौभाग्य से तभी उनका नाम पुकारा गया और वे बड़ी राहत महसूस करते हुए उठ गये।
भीतर काले कांच की टॉप वाली बड़ी मेज़ के पीछे तीन आदमी बैठे थे। बीच वाला पैंतीस-चालीस की उम्र का होगा। चेहरा गोल, चिकना और गोरा। सुनहरे फ्रेम का चश्मा उसके चेहरे पर फब रहा था। उसके दाहिने बायें के लोग अधेड़ वय के थे।
बीच वाले ने पूछा, ‘मिस्टर वी के मेहता?’
मेहता साहब ने विनम्रता से ‘जी’ कहा।
बीच वाला बोला, ‘आप एकाउंट्स ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए?’
मेहता साहब ने फिर ‘जी’ कहा।
वही आदमी बोला, ‘हम आपकी सर्विसेज़ का फायदा ज़रूर उठाना चाहेंगे। आप एक्सपीरिएंस्ड हैं । नये लोगों को तो काम सिखाने में ही दो महीने लग जाते हैं। मैंने आपके पेपर्स देखे हैं।’
मेहता साहब ने चेहरे पर कृतज्ञता का भाव लाकर सिर हिलाया।
बीच वाला आदमी हंस कर बोला, ‘रिटायर्ड लोगों को काम पर रखने का एक और बड़ा फायदा होता है। वे हड़ताल नहीं करते। नौजवानों का हाल तो यह है कि कंपनी में थोड़े पैर जमे नहीं कि हड़ताल शुरू। कंपनी की तरफ उनका कोई कमिटमेंट नहीं होता।’
मेहता साहब को उसकी बात पर झटका लगा। तो वह आदमी उन्हें बिलकुल सुरक्षित, हानिरहित समझता है। दूसरे शब्दों में मृत, अंतरात्माहीन, चलता फिरता ‘रोबो’।
गोरा आदमी अपनी तर्जनी से चश्मा पीछे धकेलते हुए, उनके चेहरे पर नज़र गड़ा कर बोला, ‘मेहता साहब, हमारी कंपनी अभी स्ट्रगल ही कर रही है। जमने में वक्त लगेगा। अभी हम आपको बीस हज़ार ही दे पायेंगे। एक साल बाद फिर सोचेंगे। आपको पेंशन तो मिलती ही होगी।’
मेहता साहब के दिमाग़ में कई बातें आ जा रही थीं। वे खोये हुए से बोले, ‘हां’।
वही आदमी बोला, ‘आपको मंजूर हो तो रुकिएगा। मैं दुबारा आपसे बात करूंगा।’
मेहता साहब बाहर आ गये, लेकिन अब उनके मन में कोई उत्साह नहीं था। दाढ़ी वाले नौजवान का नंबर अभी तक नहीं आया था। जिन नौजवानों का इंटरव्यू हो चुका था वे जा चुके थे, लेकिन रिटायर्ड लोग सभी हाज़िर थे।
मेहता साहब ने सुना दाढ़ी वाला कह रहा था, ‘ये प्राइवेट कंपनियों वाले हमारी मजबूरी जानते हैं, इसलिए अगर नौकरी मिल भी जाए तो दस्तखत होगा पचास हजार पर और मिलेंगे बीस हजार। न जीने देंगे,न मरने देंगे। ड्यूटी आठ घंटे, दस घंटे। खून की एक एक बूंद चूस लेंगे। काम करना हो तो करो नहीं तो मुंह काला करो। तुम जैसे हजार मिल जाएंगे। सरकार इनका कुछ नहीं उखाड़ सकती।’
मेहता साहब अपराधी जैसे बैठे उसकी बातें सुनते रहे।
जल्दी ही उसका भी नंबर आ गया और वह भीतर चला गया। तम्हाने साहब मेहता साहब से बोले, ‘आपको भी रुकने को कहा है?’
मेहता साहब कुछ चिढ़कर बोले, ‘जी’।
तम्हाने साहब उत्साह में बोले, ‘मुझे भी कहा है। लगता है सिर्फ रिटायर्ड लोगों को ही रोक रहे हैं।’
उनकी बात से मेहता साहब के चेहरे पर गुस्सा उभर आया, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।
दाढ़ी वाला नौजवान बाहर निकला। निकलते ही व्यंग्य के स्वर में बोला, ‘इंटरव्यू की औपचारिकता समाप्त।’ फिर किसी की नकल करता हुआ बोला, ‘जेंटिलमैन, वी विल इनफॉर्म यू बाई पोस्ट।’
फिर रिटायर्ड लोगों की तरफ आकर बोला, ‘शायद आप लोगों को रुकने के लिए बोला है।’
मेहता साहब ने सिर झुका लिया। तम्हाने साहब ने ‘हां’ कहा।
नौजवान बोला, ‘मैं जानता था। आप ही लोगों में से किसी को नौकरी मिलेगी। जिसे भी मिले उसे बधाई। इसी तरह भावी पीढ़ी की जगह पर बैठकर जिन्दगी भर मलाई खाते रहिए और हमें आशीर्वाद और शुभकामनाएं देते रहिए।’
वह लंबे-लंबे हाथ फेंकता, लापरवाही दिखाते हुए चला गया। जल्दी ही सारे नौजवान गायब हो गये। सिर्फ रिटायर्ड ही बचे।
मेहता साहब का दुबारा बुलावा हुआ। वही चश्मे वाला बोला, ‘हम आपको लेना चाहेंगे, मेहता साहब। अगर आपको हमारे टर्म्स मंजूर हों तो आप कल से काम पर आ जाएं।’
मेहता साहब ने जवाब दिया, ‘मुझे अफसोस है, मैं यह नौकरी नहीं कर सकूंगा।’
वे तीनों विस्मित हुए। चश्मे वाला बोला, ‘वी आर सॉरी। हम तो समझे थे कि आप हमारे साथ काम करेंगे। हम आपको हज़ार दो हज़ार ज़्यादा दे सकते हैं।’
मेहता साहब ने सिर हिलाया, कहा, ‘पैसे वाली बात नहीं है। मुझे आपसे एक रिक्वेस्ट करनी है।’
चश्मे वाला आगे की तरफ झुक कर बोला, ‘कहिए।’
मेहता साहब बोले, ‘आप यह नौकरी रिटायर्ड लोगों को मत दीजिए। किसी नौजवान को ही मौका दीजिए। उनमें बहुत से ब्रिलिएंट होते हैं।’
चश्मे वाले के चेहरे पर अप्रसन्नता का भाव आ गया। बोला, ‘हमें अफसोस है, मिस्टर मेहता, इन मामलों में हम बाहर वालों की सलाह नहीं लेते। हम कंपनी के इंटरेस्ट्स के हिसाब से काम करेंगे। थैंक यू। आप जा सकते हैं।’
मेहता साहब बाहर आ गये। उनके मन से एक बोझ हट गया था, लेकिन फिर भी सारे दिन उन्हें उदासी घेरे रही।
दो-तीन महीने बाद एक दिन बस स्टॉप पर उन्हें तम्हाने साहब मिल गये। सलाम-दुआ के बाद मेहता साहब ने पूछा, ‘कहां जा रहे हैं?’
तम्हाने साहब ने जवाब दिया, ‘काम पर। उस दिन आपने शायद मना कर दिया तो मुझे अपॉइंटमेंट मिल गया।’
मेहता साहब बोले, ‘कितना दे रहे हैं?’
तम्हाने साहब कुछ शर्मा कर बोले, ‘बीस हजार। पेंशन के साथ बुरा नहीं है।’
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद तम्हाने साहब बोले, ‘मालूम है? पांच छः दिन बाद दफ्तर में वही दाढ़ी वाला लड़का आया था, वही जो इंटरव्यू के टाइम ‘भासन’ मार रहा था। कंपनी ने ‘रिग्रेट’ का लैटर भेजा था, उसी को लेकर आया था। खूब हंगामा किया। मैनेजर से पूछता था हम में कौन सी कमी है जो हमें नौकरी नहीं दी। मेज पर मुट्ठियां पटकता था। फिर मैनेजर ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने दो तीन झापड़ लगाकर बाहर धकेल दिया, फिर लौट कर नहीं आया। एकदम इंडिसिप्लिंड लॉट।’
वे ‘ही ही’ करके हंसने लगे और मेहता साहब के पेट में मरोड़ सी उठी। इतने में बस आ गयी। तम्हाने साहब बोले, ‘आइए।’
मेहता साहब बोले, ‘आप निकल जाइए। मुझे जल्दी नहीं है। दूसरी बस से जाऊंगा।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





संवेदनशील, मर्मस्पर्शी। सोचने के लिए मजबूर करती रचना। साधुवाद।🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।