डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
- तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
- मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
- ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
- बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
- विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कहानी – साहब की घड़ी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है।
एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है।
साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?”
साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”
शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था।
साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है?
तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”
साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”
साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं।
हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था।
साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।”
साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”
© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






