श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆
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प्रफुल्लित डाल पर आरी को चलाता वह ।
सभी के मन में सदा लालच जगाता वह।।
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वृक्षों का काम, छाया और फल को देना।
कर्तव्य के भाव हर पल में बताता वह।।
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इंसानियत के मापदंडों को भुलाकर।
अपनी उंगलियों में सबको नचाता वह।।
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बढ़ रहे हैं धरा पर सब अपनी ही डगर।
ले उड़ा आकाश में सपने दिखाता वह।।
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कुछ के मन की चाहना तो है बड़ी विचित्र।
कंधे में गन को रख, खुद को रिझाता वह।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002
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