श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९१ ☆

भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

मानसून भारतीय जीवन का केवल एक मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर मिलन का पर्व है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती नवजीवन से भर उठती है और वातावरण में हरियाली का संदेश फैलने लगता है। यही कारण है कि पौधारोपण के लिए वर्षाकाल को सबसे उपयुक्त समय माना गया है।

पौधे लगाने से पूर्व भूमि की तैयारी, जैविक खाद का उपयोग तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन आवश्यक है। वर्षा का प्राकृतिक जल पौधों की जड़ों को मजबूती देता है और उनके विकास में सहायक बनता है। किंतु पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना है।

भारतीय संस्कृति में भी वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व रहा है। सावन, हरियाली अमावस्या, तीज तथा नागपंचमी जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। हमारे लोकगीतों, लोकपरंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में वृक्षों को जीवनदाता और पुण्य का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार मानसून की रिमझिम फुहारें केवल खेतों और बागों को ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी सिंचित करती हैं।

आज आवश्यकता है कि हम वर्षा ऋतु को केवल मौसम परिवर्तन के रूप में न देखें, बल्कि इसे हरियाली बढ़ाने और प्रकृति से अपने संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाएँ। एक पौधा लगाना पर्यावरण संरक्षण का कार्य है, तो उसकी देखभाल करना संस्कृति और संवेदना का निर्वाह। वास्तव में वर्षा, वृक्ष और संस्कृति का यह संगम जीवन को संतुलित, सुंदर और समृद्ध बनाता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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