श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१८ ☆

☆ इन दिनों लन्दन से ☆

?  आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ प्रधानमंत्री निवास एक रैन-बसेरा सा बन गया है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और जनता की अपेक्षाओं का दबाव किस हद तक बढ़ चुका है। बोरिस जॉनसन का जाना हो या फिर हाल ही में कीर स्टार्मर का पद छोड़ना, ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अब प्रेस और जनता के निरंतर डर के साये में काम करने को मजबूर हैं।

ब्रिटिश राजनीति में जवाबदेही के मानक अत्यंत कड़े हैं। वहां का लोकतान्त्रिक संस्कार किसी भी छोटे से छोटे नैतिक स्खलन को भी स्वीकार नहीं करता। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफों की सूची को देखें तो कारण अक्सर बड़े नीतिगत संकटों के बजाय व्यक्तिगत नैतिकता और आचरण से जुड़े रहे हैं। कभी कोविड नियमों के उल्लंघन का छोटा सा विवाद (पार्टीगेट), कभी पारिवारिक सदस्य की फीस या निजी खर्चों से जुड़ी पारदर्शिता का अभाव, तो कभी मामूली से प्रतीत होने वाले राजनीतिक फैसलों पर मीडिया का आक्रामक रुख, इन छोटी-छोटी बातों ने सरकार की नींव हिला दी। प्रधानमंत्री बदल गए । यह अस्थिरता दर्शाती है कि वहां का नेतृत्व अब एक ऐसी सूक्ष्म परीक्षा से गुजर रहा है जहाँ कोई भी मानवीय त्रुटि उसके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है।

आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में, जहाँ हर छोटी घटना पल भर में सुर्खियों में आ जाती है, वहां के राजनेताओं की निजता और राजनीतिक आज़ादी लगातार सिमट रही है। प्रेस की भूमिका वहां एक सजग प्रहरी से बढ़कर सीधे तौर पर एक निर्णायक की हो गई है। जब मीडिया किसी व्यक्तिगत आचरण या पारदर्शिता के मुद्दे को राष्ट्रहित का नाम देकर उछालता है, तो वहां के प्रधानमंत्री के लिए अपनी कुर्सी बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन जाता है। प्रधानमंत्री की आज़ादी का अर्थ वहां निरंकुशता से नहीं, बल्कि स्थिरता से है, जो अक्सर मीडिया के निरंतर दबाव में बिखरती दिखती है।

भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश डेमोक्रेसी की ही जड़ से निकली है, लेकिन इनके काम करने के तरीकों में बड़ा अंतर है। ब्रिटेन में नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक स्थापित राजनीतिक परंपरा है और वहां का जनमत त्वरित परिणामों की मांग करता है, जिससे नेतृत्व पर दबाव बहुत जल्दी बढ़ जाता है। इसके विपरीत, भारत में जवाबदेही की परिभाषा थोड़ा अलग है। यहां की सरकारें अक्सर एक बड़े और व्यापक जनादेश के साथ काम करती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, फिर भी वे स्वयं को सारी आबादी के प्रतिनिधि के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं। भारतीय राजनीति में मीडिया का दबाव और विमर्श तो चलता है, लेकिन हमारा तंत्र अधिक लचीला है। यहां सत्ता को केवल मीडिया के शोर से हिला पाना कठिन है, क्योंकि भारतीय राजनीति का ढांचा नैतिक शुद्धता के साथ-साथ शासन की निरंतरता और स्थायित्व को भी प्राथमिकता देता है।

लोकतंत्र के इस रंगमंच पर एक संतुलन की आवश्यकता है। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रेस का स्वतंत्र होना अनिवार्य है, लेकिन उसे जज की भूमिका से निकलकर एक सुझावकर्ता की भूमिका को भी समझना होगा। उसे यह अहसास होना चाहिए कि अत्यधिक अस्थिरता अंततः राष्ट्र के विकास की गति को बाधित करती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में पारदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

अंततः, लोकतंत्र की सार्थकता इसमें नहीं है कि कौन कितनी जल्दी इस्तीफा देता है, बल्कि इसमें है कि व्यवस्था चुनौतियों के बीच भी कैसे निरंतरता बनाए रखती है। ब्रिटेन का उदाहरण हमें सीख देता है कि यदि हम अति-संवेदनशीलता और निरंतर दबाव की संस्कृति को बढ़ावा देंगे, तो प्रशासन केवल अगली हेडलाइन को मैनेज करने में ही उलझा रहेगा। भारत के लिए भी यह एक दिशा-दर्शन है कि उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र प्रेस के बीच एक ऐसा सेतु बने, जहां सवाल तो बेबाकी से पूछे जाएं, लेकिन सरकार की स्थिरता और राष्ट्र की कार्ययोजना को दांव पर न लगाया जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में छिपी है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted