श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मेरे भीतर।)

☆ शशि साहित्य # ३६ ☆

? कविता – मेरे भीतर…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

किसने रखे हैं कदम इस चमन में,

पत्थर भी खिल के फूल हो गए हैं…

कुछ आहट है पहचानी सी,

वीरानियां भी खोकर, मधुमास हो गई है…

 

क्या हुआ जो आसमान से गिरने वाली यह बूंदें,

आजकल क्यों मोतियों की लड़ी होने लगी हैं…

बहुत लंबी, धनी काली रात, का साया…

अंधियारी को चीर कर किरणें नाचने लगी हैं…

 

यह कमजोर लरजते भीगे पंख,

हिम्मत करके ये छोटी चिरैया, पंख फड़फड़ाने लगी है…

यह कदमों की आहट, यह मधुमास का होना…

यह मोतियों की लड़ी, ये नाचती हुई किरणें…

यह छोटी सी चिड़िया की, बड़ी सी हिम्मत…

ये सब तो मेरे भीतर है, आंखें बाहर क्या खोजने लगी हैं??

 

अरसे से राह देख रही थी, उम्मीदों की…

अब तो जिंदगी, बेकार से कर्जों को उतारने लगी है…

शुक्र है तेरा, और रहमत है तेरी…

बुझने वाली चिंगारी, अब ज्वालामुखी होने लगी है…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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