श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१६ ☆
☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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कब सें चिल्ला रई महतारी ।
ठठरी बंधे की दें खें गारी ।।
आग लगे जा मोबाइल में ।
सब के हाथ जा नै बीमारी।।
डुकरो कहे उठा ले हम खों ।
खत्म भई अब हमरी पारी ।।
अज़ब समैया आन पड़ो है।
जायदात में मारा मारी ।।
रिसबत खों कोनउ ने छूटो
सबरे खा ऱये, का पटवारी
घर आंगन की नन्ही चिरैया
फ़ांस ऱये जे तन के शिकारी
जे कल मुंहे नाम डुबा ऱये ।
कर कर खें करतूतें कारी ।।
इनखों सूली पै चढ़वा दो ।
तबै जुड़े है छाती हमारी ।।
नेता झूठई शान में डूबो ।
डाल खें जेब में दुनिया सारी ।।
“संतोष”अब सम्हल खें चलियो
तुम्हें ने आबे दुनिया दारी
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
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