श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “प्रचार का विचार।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। यदि प्रचारक में विपणन क्षमता है तो वह कुछ भी बेच सकता है ।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 26 ☆

☆ प्रचार का विचार

कहते हैं विचार में बहुत ताकत होती है। एक क्रांतिकारी विचार समाज में उथल-पुथल मचा सकता है। ऐसे ही एक नए- नए बने ; विचारक ने समाज सेवा का प्रस्ताव रख ही दिया। अब तो बिना प्रोडक्ट के ही चर्चा ने तूल पकड़ लिया। बहुत सारी सभाएँ हुयीं। प्रचार में खूब पैसा खर्च किया गया। पर कोई इन्वेस्टर आया ही नहीं। लोग फूल- माला लेकर बैठे रह गए। अब सबके चेहरों पर उदासी साफ देखी जा सकती थी।

तभी टीम के मैनेजर ने कहा देखो,फिर से जोर आजमाइश करो, प्रचार  का प्रसार होना ही चाहिए। सब लोग फिर ; पूरी ताकत से जुट गए। कर्म का रंग तो निखरना ही था। सो धीरे – धीरे लोग आने लगे कि चलो कम से कम यहाँ बैठ कर चाय नाश्ता ही करेंगे। जो आता उसका खूब स्वागत सत्कार होता। उसे सैम्पल के रूप में स्लोगन लिखा हुआ पोस्टर मिलता। पोस्टर के अंत में लिखा था कि जो जितने पोस्टर दीवार पर चिपकायेगा उसे उतना ही कमीशन मिलेगा, अब तो जो पढ़ता वो और लेने के चक्कर में जी हजूरी करता।

देखते ही देखते सारे पोस्टर बँट गए। अगली सुबह पूरे शहर की दीवारें भरी हुई थीं। लोगों को भी समझ में आया कि बंदे में दम है। देखो हम लोगों ने अपनी तरफ से खूब रोड़े अटकाए पर सब बेकार गए।

अब तो सबकी जुबान पर उसी के चर्चे थे। जब- जब किसी की चर्चा जोर पर होती है;  तब – तब पर्चा बिगड़ता ही, शायद नज़र लग जाती है। ये नज़र भी नज़र नहीं आती किंतु प्रभावशील अवश्य होती है। इसका तोड़ तो बस नज़र बट्टू काला टीका ही होता है। सो अगले दिन कुछ विघ्नसंतोषियों ने ये कार्य कर ही डाला। अब पुनः एक बार उदासी छा गयी।

पर मैनेजर तो गुणवान था सो उसने फिर से तोड़ निकाला अब कि बार प्रोडक्ट की झलक ही दिखा दी, सो हारी हुई बाजी फिर से जीत की ओर चल पड़ी। कहते हैं सफल व्यक्ति जितनी बार  गिरता है, उतनी बार पुनः नयी ऊर्जा से लबरेज होकर उठ जाता है। और नए उत्साह व साहस के साथ पुनः जुट जाता है अपने विचार के प्रचार में, सो ऐसा ही खेल चलता रहता है, लोग अपनी – अपनी डफली पर अपना – अपना राग अलापते रह जाते हैं जबकि कर्मशील इतिहास रच देते हैं।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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Shyam Khaparde
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अच्छी रचना

Chhaya saxena
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हार्दिक धन्यवाद

Kavya saxena
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बहुत बढ़िया

Chhaya saxena
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धन्यवाद