श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अभिमान की डिजिटल गाथा” यह रचना एडमिन द्वारा संचालित सोशल साइट्स के कार्यप्रणाली और सदस्यों के मनोविज्ञान का सार्थक विश्लेषण करती है । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 31 – अभिमान की डिजिटल गाथा ☆
भाव बढ़ने के साथ; प्रभाव का बढ़ना तय ही समझ लीजिए। जीवन में भले ही अभावों का दौर चल रहा हो किन्तु स्वभाव तो ऐसा रखेंगे; जिससे दुर्भाव ही उत्पन्न होता हो। क्या किया जाए ये अभिमान चीज ही ऐसी है कि जिसे हुआ समझो वो अपने साथ- साथ सबको ले डूबता है। घमंड का साथ हो और छप्पर फाड़ कर जब अनायास कुछ मिलने लगता है, तो बहुत सारे प्रतिद्वंद्वी भी तैयार हो जाते हैं। ऐसी ही कुछ कहानी डिजिटल समूहों के एडमिन की भी होती है।
जरा – जरा सी बात पर हाय तौबा करना, पूरे पटल को सिर पर उठा लेना। नए- नए नियमों को बनाना फिर लागू करवाना। अरे भई संख्या बल यहाँ भी आ टपकता है। जब अपनी पकड़ मजबूत हो तो जिसे जो जी चाहे कहते रहो, पूरे सदस्य का भरा- पूरा डिजिटल परिवार है। कुछ लोग रूठ कर चले भी जाएँ, तो क्या फर्क पड़ता है। जहाँ भी जायेंगे यही राम कहानी गायेंगे, इससे मुफ्त का प्रचार होगा। कि फलाँ ग्रुप बहुत अहंकारी है, नए नियमों की तो रोज ही बौछार करता है। और जितनी भी बुराई हो सकती है, कर देंगे।
पर मजे की बात तो ये है, कि व्यक्ति वहीं आकर्षित होता है, जहाँ पूछ- परख कम होती हो। कुछ नया सीखने को मिलता हो। जब तक नयापन हो तभी तक लगाव जायज रहता है,जैसे ही वहाँ पहचान बढ़ी, तो अड़ंगेबाज लोग अपनी असलियत पर उतर ही आते हैं और सुझावों का दौर शुरू कर देते हैं।
अरे भई जोड़- तोड़,और सलाह देने में तो हम सबकी मास्टरी है, बस आवश्यकता उन लोगों की है जो नियमों का पालन करें।
ऐसे लोगों की खोजबीन में सारे एडमिन लगे रहते हैं, जैसे ही कोई जुझारू व्यक्ति मिला, बस उसकी धरपकड़ शुरू हो गयी। मीठी भाषा से रिझा कर कार्य करवाना व सम्मानित करना तो अभिमान की पहली सीढ़ी है। बस समझो सफल शुरुआत हो गयी। बदलाव करते रहिए, बढ़ते रहिए।
कुछ न कुछ करते रहने वालों का सम्मान तो बनता है, भले ही अभिमान क्यों न सिर पर चढ़ने लगे। धीरे- धीरे कब ये सारे चरण पार कर सुप्रीमों की श्रेणी में आ बैठता है, पता ही नहीं चलता। हद तो तब होती है जब ये एडमिन को ही अपना असली रूप दिखाने लगता है। बस फिर क्या एक झटके में रिमूव रूपी तलवार से काम तमाम।
अभिमान और अहंकार तो किसी के नहीं टिकते तो इन सामान्य डिजिटल सदस्यों के कैसे बचेंगे,इसी पर चिंतन – मनन जारी है।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
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